ज़ुस्तज़ू-ए-यार | अदिति चटर्जी

जुस्तजू-ए-यार में मशरूफ होना गर लाज़मी है,
कू-ए-दिल में हंगामा होना तो लाज़मी है।

वो भी आएगा के जब आएगी मेरी याद,
मोहब्बत में इतना गुमान होना तो लाज़मी है।

पड़ी धुप गर जो मिज़्गान-ए-यार,
मेरे आँचल का शामियाना होना तो लाज़मी है।

जो चुभ गई थी नावक-ए-नाज़,
यूं मेरा मरीज़-ए-इश्क़ होना तो लाज़मी है।

बेवफा पे होता ही क्या तासीर-ए-इश्क़,
सिला-ए-वफ़ा का जांकनी होना तो लाज़मी है।

बिताये कितने शाम मैंने पास के मैख़ाने में,
दर्द-ए-हिज़्र के जाते ही, मुग़ां का यार होना तो लाज़मी है।

 

-अदिति चटर्जी

 

Aditi Chatterji
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