Wo Sirf Chhaye Saal Ki Bacchi Thi Yar | Mid Night Diary | Anupama verma

वो सिर्फ छह साल की बच्ची थी यार | अनुपमा वर्मा

बहोत मुश्किल था
पर मन बना लिया था
अब नही लिखूंगी।
लेकिन कल शाम जब मैने
गांव मे कदम रखा
तो
देखा..

गांव की सारी औरते मिलकर
एक औरत को बुरी तरह मार रही थी
दूसरी तरफ गांव के सब आदमियो ने
उस औरत के पति को मार मार कर
अधमरा कर दिया था
मै जानती हूँ उस औरत को
वो हमारी ही तरह है बुरी नही है
फिर उसे क्यूँ मारा जा रहा है
क्या किया है उन्होने

जब कुछ अनचाहा होता है ना
तो हम चीखते है, चिल्लाते है
लेकिन जब उससे भी ज्यादा कुछ हो
तो खामोशी सबसे बडी हो जाती है
कि सारे अल्फाज, सारी बाते
चीखना, चिल्लाना सब का सब
मामूली और बेअसर लगने लगता है
और उसे इस हालत मे देखकर
मै खामोश हो गई थी
जैसे गले मे आवाज कभी थी ही नही

उस औरत को सब औरते मार रही थी
लेकिन एक औरत सिर्फ रो रही थी
बहोत, बहोत, बहोत बुरी तरह से
“मैने तुझे कहा था अपने बेटे को समझा ले”
रोते रोते वो औरत
बार बार बस यही दोहरा रही थी
और रो रही थी

इस पूरे झगडे के बीच
सबसे ज्यादा शोर वहाँ सन्नाटे का था
उस सन्नाटे मे मैने उस लडके को खोजा
वो नही था वहाँ
वो 11Th क्लास का लडका
एक छह साल की बच्ची को
अपनी हवस का शिकार बनाकर,
अपने माँ बाप को अपने किए की
सजा भुगतने के लिए छोडकर
भाग गया था

अब क्या
कुछ इंसाफ के लिए मोमबत्तियाँ जलाऐगे
कुछ जुवेनाइल कहकर उसकी सजा माफ कराएंगे
कुछ लोग हस्ताक्षर बरसाएंगे
और मुझे कोई हैरानी नही होगी
मै जानती हूँ
कि उन हस्ताक्षरो मे उस लडके के भी
हस्ताक्षर मिल जाएंगे

मुझे पता है
मेरे लिखने से भी
इंसाफ नही मिलेगा उसे
पर क्या है ना
पेट मे बात नही पचती
मै कल से खुद से यही दोहरा दोहरा कर थक गयी हूँ
और अगर मुझे वो लडका कही मिल जाए ना
मै उससे भी सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ
“वो छह साल की बच्ची थी यार”
“सिर्फ छह साल”

काश समझ पाते तुम!
तो मै खुद का फैसला कभी वापस नही लेती
“कभी नही लिखती”

 

-Aupama Verma

 

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