Wo Ladki | Mid Night Diary | Dharmendra Singh | #UnlockTheEmotion

वो लड़की | धर्मेंद्र सिंह | #अनलॉकदइमोशन

वो पास वाले मेरे…घर में ही रहती थी
न बोलती जुबां से, वो नैनों से कहती थी

फिर एक दिन वो चली गई, मुझे बिन बताये
हम घूमते थे फ़कीर से…दौलत लुटाये

उसके जाने के बाद मैं अकेला हो गया
कि जैसे बिन झूले के मेला हो गया

मंदी के बाजारों में, हज़ारों दिल बिकने लगे
अब रातों को सूरज, दिन में चाँद तारे दिखने लगे

मेरी नींद और चैन जैसे कहीं फरार हो गए थे
अंग्रेजी क्या! देसी वाले भी मेरे यार हो गए थे

ख़ुदा की इबादत से मैं हट सा गया था
ख़ुशी बेचने वाले जो परवरदिगार हो गए थे

तुम क्या जानो, क्या मेरी हालत हुई थी
चल गई कुल्हाड़ी जहाँ चलनी सुई थी

अब ये सोच के मैं पागल हुए जा रहा था
क्या मुझसे ऐसी वो गलती हुई थी?

समझता, संभलता मैं जब तक जहाँ में
मोहल्ले में फिर एक नई एंट्री हुई थी

वो सामने वाले…मेरे घर में रहने लगी
न आँखों से न जुबां से, सीधे दिल से कहने लगी

अब तो भोर में रोज मेरा टहलना शुरू हो गया था
देखकर उसको मेरा संभलना शुरू हो गया था

बातों से भी आगे अब वो बातें होनें लगीं
कहीं छुप के मिलने वाली मुलाकातें होने लगीं

फ़िर एक रोज़ सर्द बारिश यूँ बरसी
मेरी निगाहें थीं उसको ही तरसीं

इंतज़ार में उसके गुम था ये वेला
छत की मुँडेर पे खड़ा था अकेला

घंटों तक उस रात बिज़ली कड़की थी
न था कोई वो टूटा तारा…वो लड़की थी

ज़िन्दगी ने वफ़ा का वो सिला दे दिया था
न था कोई जहाँ अब वो किला दे दिया था

अब न खुदा की इबादत, न खुद की ज़रुरत थी
चल पड़ा ये आशिक़, जहाँ उसकी मोहब्बत थी

चंद लब्जों में “धर्मा” तू क्या कह गया
कौन है यहाँ, किसको बयां कर गया

आना फिर लौटकर…लेकर एक दास्तां
मंज़िल तो बहुत हैं, तुम दिखाना इक रास्ता

इश्क़जादो! तुम्हारे न कभी बैंड बाजे निकले हैं
आशिकों की बारात में तो जनाज़े ही निकले हैं

 

 

-धर्मेंद्र सिंह

 

Dharmendra Singh
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