वो इंसान नहीं हैवान था | प्रकाश कुमार

वो तड़पती रही , वो तड़पाता रहा ,
वो दर्द से कराहती रही , वो
अपनी हवस बुझाता रहा ।
वो मिन्नतें करती रही अपनी
रिहाई कि ,
वो अपनी दरिंदगी का चेहरा
उसे दिखाता रहा ।
वो इंसान नहीं हैवान था ,
जो इंसानों में खुद को
छुपाता रहा (2)

वो पूछती रही कुसूर अपने ,
वो जख्म उस पर बनाता रहा ।
वो ढूंढती रही रिश्तेदार
अपने ,
वो उस नन्ही सी जान को सताता
रहा ।
वो लड़ती रही अपने सम्मान
बचाने को ,
वो उसकी सहजता को आजमाता रहा

वो इंसान नहीं हैवान था ,
जो इंसानों में खुद को
छुपाता रहा (2)

वो बोलती रही मैं तो हूँ
तुम्हारी बेहेन , बेटी जैसी ,
वो हैवानियत से उसे ताड़ता
रहा ।
वो बोलती रही मैं तो हूँ छोटी
गुड़िया जैसी ,
वो जानवरों की तरह उसे मारता
रहा ।
वो रोती रही , बिलखती रही ,
अपने जख्मों को समेटती रही ।
वो फिर भी अपनी हवस की खातिर ,
उस बेचारी को जिल्लत कराता
रहा ।
वो इंसान नहीं हैवान था ,
जो इंसानों में खुद को
छुपाता रहा (2)

कैसे कहूँ कि मेरा देश अब तक
महान है ।
एक तरफ औरत दुर्गा , काली और
लक्ष्मी
तो दूसरी तरफ निर्भया , आसिफा
और उषा समान हैं ।
कैसे कहूँ इस देश में औरत आज
भी भगवान है ,
कैसे कहूँ भारत माता की अब भी
बची सम्मान हैं ।

अब माफ करदो मेरी बहनों हम
कुछ भी कर ना पाए हैं ,
अपने ही देश की बेहेन ,
बेटियों कि इज़्ज़त बचा ना पाए
हैं ।
क्या कहें हम दूसरों को जब हम
खुद की ही सोच बदल ना पाएं
हैं ,
जिस देश को हम माता केहते हैं
,
उस देश की ही बेटियों कि ,
इज़्ज़त नीलाम कर आये हैं ।
अब माफ करदो , अब माफ करदो , अब
माफ करदो ।।।।

 

-प्रकाश कुमार

 

Prakash Kumar
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