Wo EK Pal | Mid Night Diary | Saransh Shrivastava | Love Poetry

वो एक पल | सारांश श्रीवास्तव | लव पोएट्री

मैं उस रोज़
घोर अँधेरे में
जब तम्हारे सीने पर
सर रख कर
बंद पलकों से लेटी हुई थी

तुम्हारी धड़कनो की आवाज़ भी कुछ बढ़ी बढ़ी सी थी
साँसे भी कुछ भारी भारी थी
मैं सुन रही थी धड़कनो को
और महसूस कर रही थी तम्हारी साँसों की गर्माहट

तम्हारी पनाह का सुकून
बड़ा सुकून भरा लम्हा था वो

और उस लम्हे में
जब
तुम जो मुझे थपकियां दे रहे थे
मेरे बालों को सहला रहे थी
मेरे गालो पर तम्हारे वो स्पर्श
बड़ा अच्छा लग रहा था मुझे

उस सुकून भरे लम्हे में
जब
मैं तम्हारी थपकियां
और धड़कनो की धुन में
अपनी उलझने तुम्हे बता रही थी
अपने दर्द तम्हे सुना रही थी

और तुम सुन रहे थे जिस तरह से मुझे
थपकियों के साथ
मद्धम साँसों में

मैंने उस एक लम्हे में
खुद को पा लिया
मैंने खुद को ढूंढ लिया
तुम में कहीं….

वक़्त को रोक तो नहीं सकते
न तुम
न मैं
न कोई
पर हाँ
वो वक़्त बस दोहराता रहे खुद को

और हम ऐसे ही साथ रहे
हमेशा से
हमेशा तक
हमेशा के लिए

और
काश
मेरी हर दुआ के बाद
एक आवाज़ आये
तुम्हारी
अमीन
सुखद था वो लम्हा
बेहद सुखद….

-सारांश

 

Saransh Shrivastava
Saransh Shrivastava

875total visits,2visits today

2 thoughts on “वो एक पल | सारांश श्रीवास्तव | लव पोएट्री

Leave a Reply