Wo - Ek Khyaal Si | Mid Night Diary | Shubham Negi

वो – एक ख्याल सी | शुभम नेगी

आज इतवार था। फुरसत वाला दिन। मैं अभी बिस्तर पर ही था। बगल से जम्हाई की आवाज़ आई। ज़िन्दगी जाग गयी थी। आज बिना अलार्म के कैसे जाग गयी? ख़ैर, मैं उसे एकटकी से निहारता रहा।

सफ़ेद पर्दों में से धूप की किरणें कूदती फांदती उसके चेहरे पर पड़ रहीं थी और उसके चेहरे को और सुंदर बना रही थी। वो बेहद खूबसूरत है। इसीलिए मैं उसे कभी कभी वक़्त निकाल निहार लिया करता हूँ।

वो बिस्तर से उठी और जाकर खिड़की खोल वहां खड़ी हो गयी। मैं गुड़गांव में रहता हूँ। किसी बिल्डिंग की सातवीं मंज़िल पर। इसलिए मेरी खिड़की से बहुत से और फ्लैट्स की खिड़कियां नज़र आती हैं। मैंने देखा सामने सबकी खिड़कियां खुल रही हैं।शायद सब आज बिना अलार्म के ही उठे थे।

मैंने तय किया कि आज पूरा दिन बस उसे निहारता रहूंगा और मैंने वही किया। कुछ देर बार बाथरूम से गाने की आवाज़ें आने लगी। उसे गाना बहुत पसन्द है। दोपहर में उसे कोई नॉवेल पढ़ते पढ़ते नींद आ गयी।

उसके चेहरे पर कितना सुकून है। मुझे कभी कभी उससे जलन होती है। वो सबकी चहेती है। पर थोड़ी अकड़ू भी। आसानी से किसी से बात नही करती। ना ही किसी से मिलती है।

ख़ैर, शाम होते होते उसने कुछ कुछ काम और किए। पर अचानक उसने देख लिया कि मैं उसे निहार रहा हूँ। तब से बस गुमसुम बैठी है। शायद नाराज़ है मेरी दखलअंदाजी से।

-शुभम नेगी

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