Wo Bachpan Ab Bhi Yaad Hai Mujhe | Mid Night Diary | Prajjval Nira Mishra

वो बचपन अब भी याद है मुझे | प्रज्ज्वल नीरा मिश्रा

जब सुबह सुबह,
चाय गैस पे होती थी और माँ गुसलखाने में।
हर रोज़ की तरह धीमी आंच पर यूँ ही चाय खौल रही होती थी।
पापा आवाज पे आवाज लगा रहे होते थे।

-“अरे कँहा रह गयी यार मेरे जूते कँहा रखे हैं।”
मैं इधर-उधर यूनिफार्म के लिए भाग रहा होता था।
इन सब के बीच वो चाय मन्द मन्द उबाल लें रही होती थी।
जैसे हमारी जिंदगियां up और Down से गुजरती हैं
माँ नहाने के बाद लौटती थीं।

पहले मुझे तैयार करके स्कूल भेजती।
फिर पापा को आफिस
और इन सबके बीच
हर दिन की तरह फिर जल्दी में।

सुबह की चाय छूट जाती थी।
माँ गुसलखाने से निकलते ही गैस बंद कर देती थीं।
पर चाय पैन में पड़ी,ठंडी हो जाती थी।
बिल्कुल वैसे जैसे माँ सबको काम पे भेज कर फ्री हो जाती हैं।

उनके चेहरे पे सुकून मैंने कम ही देखा था।
क्योंकि मैंने हमेशा उन्हें काम करते देखा था।
पर शायद उनका सुकुन सबको खुश रखने में था।

कभी कभी तो चाय पे गुस्सा आती थी
पता है क्यों,
क्योंकि एक चाय ही तो थी जो मेरी माँ को बहुत दौड़ती थी।

-अरे सुनती हो चाय बना दो सर दुख रहा है।
-माँ एक कप चाय मिलेगी।
-मम्मी चाय बना दो मेरे दोस्त आ रहा हैं।
पर माँ ने कभी किसी से कहा ही नही।
Infact खुद से भी कभी नही कहा
कि एक कप चाय बना दो।

माँ हमेशा चायपत्ती वाला डिब्बा भरती रहीं,
और हम सब खाली करते रहे।
कोई कंप्लेंट नही कर रहा हूँ मैं।
क्योंकि शायद माँ का सुकून भी
सबके लिए काम करते रहने में ही होता था।

आज बहुत कुछ बदल गया है।
पापा रिटायर हो गए।
मेरा शहर आ जाना।
बहन की शादी हो जाना।
पर आज भी जब घर जाता हूँ।

और माँ मुझे लैपटॉप पे कुछ करते देखती है।
तो उनका अब भी वही सवाल होता है।
“चाय बना दूं बेटा।”
मैं नही कह रहा कि माँ का हाँथ बटाया जाए।
पर atleast एक काम तो कर सकता हूँ मैं।
सिर्फ मैं क्यों आप हम और हम सभी।

की अब जब भी घर छुटियों में जाना।
और माँ को यूँ ही अस्त व्यस्त काम करते पाना।
तो चुपके से दो कप चाय गैस पे चढ़ा देना।
माँ कितना भी रोकें पर फिर भी,
माँ को पकड़ना और साथ बिठा लेना।

और फिर उस चाय के उबाल के साथ
बातों के उबाल भी आते रहने देना।
कुछ बताना माँ को,
और उनसे भी उनका हाल जान लेना।

उबाल आने लगे दो कपों में उस चाय को छान लेना।
एक कप माँ को देना और एक प्याला तुम थाम लेना।
बस इतना चाहता हूँ कि उस चाय के बहाने सही हो सके,
तो अपनी माँ को थोड़ा सा जान लेना।
उस दो कप चाय में वो सुकून ले आना
जो स्कूल जाते-जाते तुमने खो दिया था।
“कैसे हो माँ ?”

उस एक चाय के साथ इस सवाल का जवाब जान लेना।
और हो सके तो चाय की चुस्कियों के संग माँ के हिस्से भी थोड़ा सुकून बांध देना।

 

-प्रज्ज्वल नीरा मिश्रा 

 

Prajjval Nira Mishra
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