वक़्त | अमन सिंह | #बेनामख़त

आखिर वक़्त का यह लम्हां भी गुजर ही गया, वह लम्हां जिसमे हम साथ हो सकते थे। वक़्त के उस कतरे में हाथों में हाथ हो सकते थे, लेकिन… यह तो अब रोज की बात हो गयी। जिंदगी में यूँ लम्हों का आना जाना तो लगा ही रहेगा, पर असल बात तो तब है जब, जिन्दगी में ठहराव आये। वक़्त की बहती तेज धार में जिन्दगी की यह कश्ती ठहरे और बस तुम्हारे साथ दूजे किनारे की तरफ जाने को मचल जाए।

तुमसे वक़्त की ख्वाहिश होती और तुम यूँ ही मान जाती और अब जब वक़्त से तुम्हारी गुजारिश करता हूँ तो यह सुनता ही नहीं पर खैर अब क्या अब तो वक़्त गुजर गया और वक़्त का वह लम्हां भी, जिसमे हम साथ हो सकते थे और हाथों में हाथ हो सकते थे।बस ऐसे ही पुराने लम्हों में से एक बेनाम सा ख़त तुम्हारे नाम उन अधूरी बातों के साथ जिन्हें मैं किसी से कह नहीं पता।

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