Waqt Ka Badalta Mizaaz

आज तुम हो साथ,
तो चाँद भी मुंडेर पर मुस्कुरा रहा है।
क्यों ना तुम्हें देखते-देखते,
मैं आज उसके सारे रंग अपनी आँखों में भर लूँ।

आज तुम हो साथ,
तो चाँद भी मुंडेर पर आकर देखो!
कैसे खुद में इतरा रहा है।
कहो,
क्यों ना तुम्हारा हाथ थामे;
मैं लेकर उसकी रोशनी अपने हाथ में,
आज अँधेरे को अपने पाँव के नीचे कर लूँ।

आज क्योंकि तुम हो साथ मेरे,
तो चाँद भी बैठा मुंडेर पर;
जाने कौन-कौन से सपने सजा रहा है।

कर लेने दो आज ये सब,
चाँद को भी और मुझे भी।
क्योंकि वक़्त का मिज़ाज शायद फिर बदल जाएगा कल।
ना तुम साथ होगे,

ना ही चाँद आएगा किसी भी रात फिर;
इस तरह अगस्त के बादलों से पार पाते हुए,
मुस्कुराने मेरे मुंडेर पर।

कल शायद मैं सोचूँ कि काश!
तुम मेरे साथ होते।
काश! चाँद फिर से उसी तरह छुपकर मेरे मुंडेर पर आता और,
देखकर हम दोनों का साथ,
फिर से उसी तरह वह ख़्वाबों में खोकर मुस्कुराता।
कल शायद मैं सोचूँ।

तो कर लेने दो आज ये सब,
चाँद को भी और मुझे भी।

 

-अर्चना मिश्रा

 

Archana Mishra
Archana Mishra
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