Wajood | Mid Night Diary | Vaidehi Sharma

वजूद | वैदेही शर्मा

मेरा वक्त, मेरे सवाल, मेरे वहम…
सब बिखरे पड़े थे जैसे किसी चादर की सलबटो से हो…..

खामोशियाँ यूँ छाई थी जैसे, ना तू बोलना जनता हो ना मैँ..
मैंने उन अल्फ़ाज़ों को कई बार दोहराना चाहा, मेरी आँखों से…

मगर तू देख ना सका! शायद रोशनी कम थी , या यूँ कहूँ की अँधेरे ज़्यादा…

और फिर वही किया गया जो एक दम सटीक और सही लगा मुझे…

तेरे उस वजूद को बचा लिया गया…मेरे उन तमाम एहसासों को मौत दे कर…

 

-वैदेही

 

Vaidehi Sharma
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