वह कोई फूल नहीं मुट्ठी भर रेत हो।

वह कोई फूल नहीं, मुट्ठी भर रेत हो | विशाल स्वरुप ठाकुर

सुबह सुबह का समय है। ओंस पड़ रही है। सारे फूल इन बूंदों से मुह धुल रहे हैं। नाराजगी अगर किसी में है तो वह गेंदा है। गुलाब के रेट बढ़ गये हैं।
“अब सब सदाबहार हो हो चले हैं। बगिया में अगर कोई मुरझाया हुआ है तो वह हम ही हैं। दिवाली बीत चुकी है और इस समय कुछ पेड़ तुलसी की तरह भी पूजे गये। और अब नकली को सजाया जा रहा है।” यह सोचता हुआ गेंदे का फूल अपनी नाजुक सी कलाई से सारे बन्धनों को तोड़ता हुआ जमीन पर आ गिरा।
“अब मौसम चला गया है इसका” सूरज की ओर ताकते हुए सूरजमुखी ने अपनी बात रखी ही थी कि ओंस की बूंदों से नहाया हुआ एक कोमल सा नन्हा सा गुलाब निकलने को बेचैन था।
“लो भाई अब तो इनके ही चर्चे होंगे।” चमेली बोली।
“क्यों जी ऐसा क्यू?” सूरजमुखी ने मुख की दिशा बदलते हुए चमेली से कहा।
चमेली बोली, “अरे आप नहीं जानते! वैलेंटाइन आ रहा है। अब किसी की प्रेमिका को गेंदा या गुडहल तो चाहिए नहीं। सबको यही शहजादा चाहिए। आखिरकार गुलाब है ये और रही आपकी बात तो आप तो सबके ससुर हो। अब भला बुड्ढ़े को कोई क्यों ले उपहार में या तो देखने में ही अच्छे होते। आप तो पुष्पों के ग्रेट खली हो।”
ये सुनकर सूरजमुखी ने बौहें चढ़ा ली। सूरज अब काफी बढ़ चुका था। चमेली चुप हो गयी। गेंदे जो दो चार बचे भी थे गिर गये और गिरे हुए थे वे सूख गये।
गुलाब को तोड लिया गया। सजाया गया। फिर किसी ने किसी की जुल्फों में लगाया तो किसी ने गुच्छा बनाकर भेंट कर दिया। और जो दे न पाया उसने एक एक पंखुड़ी को इस कदर मसला जैसे वह कोई फूल नहीं मुट्ठी भर रेत हो।
-विशाल स्वरुप ठाकुर
विशाल स्वरुप ठाकुर
विशाल स्वरुप ठाकुर

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2 thoughts on “वह कोई फूल नहीं, मुट्ठी भर रेत हो | विशाल स्वरुप ठाकुर

  1. फूलों की कहानी बेहद ख़ूबसूरती से पिरोई है

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