Unknown Smiley

“यार आज फिर से लेट हो गया। आज तो सर जान लेलेंगे मेरी… ” अमित ने गेट पर ताला लगते हुए खुद से कहा और लगभग दौड़ते हुए जीने से नीचे उतरा। जल्द ही वह सड़क पर आ गया लेकिन जब तक वह बस स्टॉप पर पहुँचता तब तक एक बस उसकी आँखों के सामने से निकल गयी। एक तो उसे देर हो रही थी, ऊपर से बस भी छूट जाने से उसका हाल बेहाल हो गया।

देर तो हो ही रही थी लेकिन उसके पास इन्तजार करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। बस स्टॉप पर लगभग आधे घंटे के लम्बे इन्तजार के बाद आखिर बस आ ही गयीव् उसने देर न करते हुए जल्दी से चढ़कर एक सीट पर अपना बैग रख दिया ताकी वह आराम से बैठ सके। बैठने चक्कर में रोज की तरह आज उसे टिकेट लेने की याद नहीं रही।

सीट पर बैठने के बाद उसने चैन की एक साँस ली और हैडफ़ोन को कानों पर लगाकर गानें सुनने लगा। अभी कोई दस मिनट ही हुए थे उसे बैठे हुए कि एक आंटी ने आकर उसे उठा दिया और न चाहते हुए भी उसे अपनी सीट छोडनी पड़ी। वह आकार बस एक पीछे जगह देखकर खड़ा हो गया। अब तक देर हो जाने की परेशानी में वह टिकट लेना भूल चुका था।

खड़े खड़े वह खिड़की से बाहर देख रहा था कि तभी रेड लाइट सिग्नल पर बस एक बार रुक गयी। पूरे १२० सेकंड का रेड लाइट सिग्नल, देखते ही देखते आस पास गाड़ियों का हुजूम लग गया। अभी सिग्नल ग्रीन होने में लगभग ५० सेकंड ही बचे होंगे कि अमित की नज़र बगल में खडी दूसरी बस पर गयी। उस बस पर नज़र पड़ते ही उसकी आँखें जैसे रुक ही गयी साथ ही साथ सांसें भी थम गयीं।

खिडकी से आती हवा से अपने बालों को संभालती एक लड़की पर उसकी नज़रें टिक गयी। उसे देखते ही अमित अपनी सारी परेशानी भूल गया। मानों वह पल वही थम गया हो। वह बड़े ही इत्मिनान से उसे देख रहा था। जैसे ही उस लड़की को यह एहसास हुआ कि कोई लड़का उसे देख रहा है तो उसने अमित की तरफ नज़रें उठाकर देखा और मुस्कुरा दी।

उसके अपनी और देखकर मुस्कुराता देख अमित अब कुछ भूल गया। वह दुबारा उससे आँखें चार कर पता इससे पहले ही रेड सिग्नल ग्रीन हो गया और बस आगे बढ़ गयी।

उस हँसते हुए अनजान चेहरे के नज़रों से दूर होते ही जैसे अमित बेहाल सा हो गया। एक बार उस लड़की को देखने की चाह में अमित ने खिड़की से बाहर झांकने की कोशिश की लेकिन बस आगे निकल चुकी थी। उस लड़की के हँसते हुए चेहरे को दोबारा न देख पाने के अफ़सोस में अमित चेहरा उतर गया लेकिन तभी बस फिर से अगले सिग्नल पर रुक गयी।

बस के रुकते ही अमित की आँखों में फिर से उम्मीद की चमक नज़र आने लगी। उसकी बस जैसे ही सिग्नल पर पहुंची वह बगल की दूसरी बस में उस लड़की को ढूंढने लगा लेकिन वह अपनी सीट पर नहीं थी। जब उसने इधर उधर देखा तो पाया कि वह अपनी सीट के पास ही खडी है। उसकी सीट पर को बूढा आदमी बैठा था। उसको देखते ही अमित ने चैन की सांस की लेकिन भीड़ की वजह से उसे उसका चेहरा साफ़ नज़र नहीं आ रहा था।

वह आगे कोई कोशिश करता इससे पहले ही टिकट चेक करने वाले बस में चढ़ गए और टिकट न होने की वजह से अमित पकड़ा गया। इतनी भागादौड़ी में उसे पकडे जाने के बाद याद आया कि वह टिकट लेना ही भूल गया। फाइन देने के लिए पर्स चेक की तो सिर्फ १०० रुपये ही थे, उसके पास। जिसके चलते टिकट चेक करने वाले देर न करते हुए उसे बस से नीचे उतार दिया। कुल मिलकर दिन की एक बहुत ही बेकार शुरुआत हो चुकी थी। बस मिलने से वक़्त पर पहुच जाने की जो एक उम्मीद भी जगी थी वह भी अब टूट गयी।

खैर अमित किसी तरह ऑफिस पहुँच गया लेकिन वहाँ भी उसे वक़्त पर न पहुंचने पर सर से डांट खानी पड़ी। जिसके बाद काम करने में उसका मन लग जाता ऐसा तो मुमकिन ही नहीं था। किसी तरह वक़्त काट कर दिन गुजरा और फिर शाम को वापस वह घर आ गया। रात में खाना खाने के बाद जब वह बिस्तर पर सोने के लिए गया तो सोने से पहले उसने पूरे दिन के बारे में हर रोज़ की तरह एक बार सोचा।

पूरा दिन तो बेकार ही था। ऑफिस देर से पहुंचा, डांट भी पड़ी, काम भी नहीं किया और तो और बस में भी बहुत पंगे हुए.. लेकिन वह एक मुस्कुराता चेहरा, अनजान चेहरा…. उसे याद करते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी। कौन था वह अनजान मुस्कुराता चेहरा, यही सोच वह नींद में खो गया।

अगली सुबह अमित की नींद अपने आप खुल गयी वो भी वक़्त से पहले… नींद से जागने से लेकर ऑफिस के लिए तैयार होने तक एक अजीब से ख़ुशी उसके चेहरे पर साफ नज़र आ रही थी। रोज़ की तरह न ही तो किसी काम की जल्दबाजी थी और न ही वह ऑफिस के लिए लेट था, लेकिन उसके क़दमों की चाल से ऐसा लग रहा था जैसे उसे ऑफिस पहुँचने जाने की जल्दी थी।

सुबह साढ़े सात बजे वह बस स्टॉप पर पहुँच गया और बस का इन्तजार करने लगा। दस मिनट बाद ही बस आ गयी लेकिन अमित बस में नहीं चढ़ा। बस आई और चली गयी। यहसिलसिला लगभग ९ बजे तक चलता रहा लेकिन अभी भी वह बस स्टॉप पर खड़ा था। सर से फ़ोन करके किसी काम का बहाना बनाकर देर से आने की मंजूरी ले ली थी उसने। जैसे जैसे घड़ी के काँटे आगे बढ़ रहे थे, उसके चेहरे की ख़ुश मिजाजी सिकन में बदलती जा रही थी।

अमित बदहाली से परेशान होता उससे पहले ही आखिर ३०६ नंबर की वही बस आ गयी, जिसका उसे बेसब्री से इन्तजार था। उसने कंडक्टर की शक्ल मिलाकर इस बात को पुख्ता कर लिया कि यह वही बस है जिस पर पिछले दिन उसने एक मुस्कुराता हुआ सफ़र किया था। बस अब इन्तजार था तो उस हसीन इत्तेफ़ाक था जो पिछले दिन हुआ था। बस अपने स्टॉप से चल निकली और जैसा कि अमित को उम्मीद थी वैसा ही हुआ। अगले ही मोड़ पर उसकी बस बिल्कुल उसी दूसरी बस के बगल में थी, जैसे की पिछले दिन था। वही बस जिसका इन्तजार उसे था। दोनों बसें एक ही रफ़्तार के साथ एक दुसरे के लगभग अगल बगल ही थी।

अब इन्तजार था उस मुस्कान का जिसके लिए अमित ने यह सब किया था। उसने खिड़की के पास से झांककर दूसरी बस में देखा लेकिन वह अनजान मुस्कान चेहरा जो उसे पिछली सुबह दिखा था, आज ओझल था। कई कोशिशो के बाद भी जब अमित को वह नज़र नहीं आई तो वह निराश हो चला। टूटी उम्मीद की डोर को पकड़ वह खिड़की के पास खड़ा कुछ सोच रहा था कि तभी उसे खिड़की के चेहरे पर अपनी परछाई के नजदीक कुछ नज़र आया।

उसने नज़रें उठाकर देखा तो वही अनजान मुस्कुराता चेहरा उसे देख मुस्कुराता रहा था। उसे देखते ही मानों जैसे कोई ख़ुशी की लहर उसके चेहरे पर दौड़ गयी। अमित का हाल बिल्कुल वैसा ही था जैसा किसी मुसाफिर का मंजिल पर पहुँच जाने पर होता है। उसके साथ मुस्कान थी।

बसें साथ चलती रही और उनका सफर तय होता रहा। अमित अभी भी उस अनजान मुस्कुराते चेहरे को सिर्फ और सिर्फ उसकी मुस्कान से पहचानता था। उसका नाम क्या है? कौन है वो? कहाँ रहती है? कहाँ जाती है? क्या करती है? उसे कुछ भी नहीं पता था। रोज़ बस का इन्तजार करना, हस्ते चेहरे को देखना और इशारों में बातें करना, बस इतना ही काम बचा था, अमित के पास…

इसी तरह से लगभग एक महीना बीतने को आ गया कि एक सुबह वह मुस्कुराता अनजान चेहरा नहीं दिखा। खैर अमित ने इस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया। बात आई और गयी हो गयी। दिन तो गुजरना मुस्किल था लेकिन फिर भी किसी तरह से वक़्त काट ही लिया। अगली सुबह वह फिर उस अनजान से चेहरे से मुलाकात की उम्मीद में बस स्टॉप पहुँच गया। हर रोज़ की तरह उसने उस दिन भी बैसा ही किया। उसी बस में चढ़ा, खिड़की के पास खड़ा रहा और जब तक दूसरी बस आ नहीं गयी तब तक उसकी बेचैनी उसके चेहरे पर नज़र आती रही।

जिस बस का इन्तजार उसे था, वह बस आ गयी, वह अनजान मुस्कुराता चेहरा जिसकी वजह से वह मुस्कुराने लग था, उस दिन भी नहीं दिखा। हर मुमकिन कोशिश की झांक झांक कर जितना हो सकता था, बस के हर तरफ नज़र डाल ली लेकिन वह अनजान मुस्कुराता चेहरा उसे नज़र नहीं आया। ऐसा करते करते लगभग एक हफ्ते होने को आ गया। वह रोज़ बस में चढ़ता, दूसरी बस आने का इन्तजार करता और जब वह अनजान मुस्कुराता चेहरा नज़र नहीं आता तो मायूस हो ऑफिस चला जाता।

वह अनजान मुस्कुराता चेहरा जो उसके चेहरे पर मुस्कान लौटाकर लाया था, वही उसकी बेचैनी, गम की वजह भी बन गया था। वह अनजान मुस्कुराता चेहरा अब अनजान कहाँ रहा था। एक अनकहा, अनजान रिश्ता जुड़ने लगा था उससे…. लेकिन तभी वह नज़रों से ओहल हो गया।

धीरे धीरे फिर से सब कुछ बदलने लगा, अमित अब फिर से वही पुरानी रूठी जिंदगी जीने लगा। अब तो ऐसा लगता जैसे वह हँसना ही भूल गया हो। वही बोरिग सी लाइफ, वह बेरंग सी शामें, सब कुछ गुजर ही रहा था कि एक सुबह वह अपना सा अनजान मुस्कुराता चेहरा अमित को फिर से नज़र आ गया। जिसे देखते ही उसका चेहरा खिल उठा। उसकी मुस्कान एक बार फिर से लौट आई थी।

इस बार अमित ने देर नहीं की और अगली रेड लाइट पर जैसे ही बस रुकी वह अपनी बस से उतरकर दूसरी बस में चढ़ गया। जैसे ही बस की रफ़्तार भी बढती जा रही थी। खैर सफ़र आगे बढ़ा और अमित भी अपने क़दमों को बढ़ा उस अनजान मुस्कुराते चेहरे के नजदीक पहुँच गया।

दोनों एक दुसरे के करीब थे, बेहद करीब… अमित की बढती धड़कन की बेचैनियाँ उसकी आँखों में उतरने लगी थी। लेकिन अमित ने खुद पर काबू किया। दोनों यूँ ही चुपचाप एक दुसरे को देखते हुए कई बस स्टॉप पार गए। गुजरते वक़्त के साथ अमित का सब्र बिखर गया और उसने पहली बार उस अनजान मुस्कुराते चेहरे से देखा, “मुस्कान.. तुम्हारा नाम मुस्कान है न…?”

“हाँ, लेकिन तुम्हें कैसे पता..? उस अनजान मुस्कुराते चेहरे ने कहा।”
“बहुत आसान था….” अमित ने जवाब दिया।
“मतलब” मुस्कान ने सवाल किया।
“जब भी तुम्हें देखा, मुस्कुराते देखा… और तुम्हे देखते ही मेरे चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती और जो इतनी सारी मुस्कान बिखेर रही हो उसका नाम मुस्कान ही हो सकता है” अमित ने हल्के शब्दों में अपनी बात समझाई।

अमित ने अभी अपनी बात कही ही थी कि तभी अचानक बीच में एक स्पीड ब्रेकर आ गया। ड्राईवर ने जोर से ब्रेक लगाई। अमित ने खुद को सँभालने की बहुत कोशिश की लेकिन वह मुस्कान के गले जा लगा। अनजाने में ही सही वह मुस्कान के बेहद करीब था। एक पल को वह उसके बालों की खुशबू में खो गया था फिर अमित ने खुद के होश को संभाला और जल्दी से अपनी जगह वापस लौटने लगा। इसी बीच एक ब्रेक और लगी और इस बार दोनों की नज़रें आमने सामने थीं। दोनों की नज़रें मिली, मुस्कान एक मुस्कुराते चेहरे के साथ अमित की आँखों में यूँ देख रही थी, जैसे मानों डूब जाना चाहती हो।

अमित उसका इशारा समझ गया और उसने देर न करते हुए कहा, “मुस्कान, तुम्हारी वजह से मैं फिर से हँसने लगा था। जिंदगी बेहतर लगने लगी थी मुझे… प्यार हो गया था मुझे… ” वह दो पल को रुका और फिर आगे बोला, “हर एक उस पल से और तुमसे जिसमे मैंने तुम्हे देखा।वह गुजरा वक़्त वापस तो नहीं आ सकता लेकिन आगे आने वाली जिंदगी को हम साथ मुस्कुराकर बिता सकते हैं।”

मुस्कान ने हँसते हुए हाँ बोलकर अमित को गले लगा लिया। बस में बैठे सभी लोग उन्हें देख तालिया और सीटियाँ बजा रहे थे।

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