Ujjhan 'Stress' | Mid Night Diary | Aman Singh

उलझन | अमन सिंह | #बेनामख़त

बस यह समझ लो कि मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ? हसूँ, मुस्कुराऊँ, रोऊँ या चिल्लाऊँ… कोई तकलीफ़ होती तो कहता, कोई दुःख होता तो ज़ाहिर करता लेकिन इस उलझन का क्या करूँ जो मेरे अन्दर है और अन्दर ही अन्दर मुझे खाती जा रही है।

वो ज़ख्म बेहद ही अच्छे होते हैं जो जिस्म पर होते हैं और मर-हम से भर जाते हैं लेकिन उन घावों का क्या? जो मन में होते हैं और जिन पर कोई दवा असर नहीं करती।

हर रात तुम पूछती हो, हर सुबह तुम कहती हो… हर पहर तुम जानना चाहती हो कि आख़िर क्या है? वजह मेरी इन बेचैनियों की, मेरी उलझनों की, जो मेरे माथे पर नहीं, मेरी आँखों में नज़र आती है। तुम्हारे उन सवालों का जवाब क्या दूँ, जब तुम नाराज़ होकर कहती हो, यह जो दिन भर तुम मुस्कुराते हो, बे-वजह ही चहचहाते हो, कैसे रखते हो ख़ुद को इतना सम्भाल कर कि यह सारी बेचैनियाँ, उलझनें कभी होंठों पर नहीं आती।

जो कह दूँ सच मैं तुम्हें, ख़फ़ा हो जाओगी कि वजह एक तुम ही हो, इन सारी बे-वजह सी उलझनों की… माना मैंने, गुनहगार तुम नहीं, इसका ज़रिया मैं ही हूँ लेकिन मेरे बस में भी कहाँ कुछ है? बस इतना जानो कि खेल यह सारा लकीरों का है और इसकी बिसाद पर हम हैं।

मैं और तुम से हम होने के इस सफ़र में शायद हमारा साथ यहीं तक हो, देखो ज़्यादा सोचना मत, ज़्यादा सोचोगी तो ये उलझने तुम्हें भी घेर लेंगी। यह मेरी उलझने हैं, मुझ तक ही रहने दो इसे… बे-वज़ह इनमे फँसकर तुम अपनी मुस्कुराहट जाया ना करो। चलो रात बहुत हो गयी अब सो जाओ क्यूँ कि तुम जागती रहोगी तो नींद मुझे भी नहीं आएगी।

 

-अमन सिंह 

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4 thoughts on “उलझन | अमन सिंह | #बेनामख़त

  1. बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में बयां किया है, इस अलग तरह की उलझन को । थोड़ी नुकशबाजी के लिए माफ़ी चाहूंगा, पहले अनुच्छेद की आखिरी पंक्ति में “खाती जा रही है” के स्थान पर “खाये जा रही है” हो सकता था।

  2. Poori kahani achhi h..khaskar “hr raat punchhti ho” wala para to gzb dha gya …akhiri pankti JB tk tum nhi soyogi..mjhe neend nhi ayegi shyd ye hr premiyo k beech kaha jaaata hhrek shbd k sath connection feel kr rhi hu…I love it

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