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उड़ान | भावना त्रिपाठी | #अनलॉकदइमोशन

हसरत किसकी नहीं होती आसमाँ में पर फैलाने की,

उस चाँद को अपनी मुट्ठी में समाने की।

उड़ो,पर इतना भी ऊँचे मत जाओ अर्श पर,
कि फिर वापस लौट कर आ ही ना पाओ फ़र्श पर।

बुरा कतई नहीं आसमाँ में पर फैलाना,
पर हाँ,यह भी सही नहीं सिर्फ़ आसमाँ में रह जाना।

अरे,उड़ते तो यह परिंदे भी हैं, पर इन्हें पता है कब नीचे जाना है,
कितनी उड़ान भर के आगे और कितना पीछे जाना है।

ये पंछी अपने वजूद से भला कब अंजान होते हैं,
कौन कहता है कि परिंदे नादान होते हैं।

हकीकत से रुबरु होते हैं ये, जानते हैं कि सिर्फ उड़ने से पंख कट जाएंगे,
यह बनते-बनते रह जाएंगे और मिटते मिटते मिट जाएंगे।

हम इंसानों को अनजाने में कितना कुछ सिखा देते हैं ये,
हमारी खातिर ही अपनी हस्ती को मिटा देते हैं ये।

एक हम इंसान हैं,जो जमीन से उठकर आसमान में रहना चाहते हैं,
और एक ये परिंदे हैं जो आसमान में रहकर भी ज़मीन का साथ निभाते हैं।

बेशक ये उड़ानें ही इन में जोश हैं भरतीं,
पर इनकी हर थकान में ये इमारतें ही इन का सहारा है बनतीं।

हर रोज एक लंबा सफर तय करते हैं ये,
पर आखिर में जमीन पर आकर ही मरते हैं ये।

कौन कहता है, इंसानो में अक्ल होती है,
कौन कहता है कि परिंदों में समझ नहीं होती है।

मैं कहती हूँ,इनसे हमें सीखना होगा,
आसमान में उड़ कर भी जमीन पर ही रहना होगा।

 

-भावना त्रिपाठी

 

Bhavna Tripathi
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