Tyohaar | Mid Night Diary | Raushan 'Suman' Mishra | Happy Diwali

त्योहार | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा | हैप्पी दिवाली

पूरा गाँव पिछले दो तीन दिन से तेल की खुशबुओं में सन गया है, लोग अस्त व्यस्त दिख रहे हैं। टोला के बिलट भी रामप्रसाद के दुकान से अपना सनुआ के लिए बीड़ी फटका ले रहा है, बुझारण पिछले सात दिन के मजदूरी को बचाकर रखा था।

जिसे अपने रमबतिया और मोहना के नए कपड़े खरीदने पर आज खर्च कर रहा है। पूरे साल में तो आज ही वो अपने परिवार के लिए कपड़ा खरीद पाता है। गाँव के बूढ़े सांठी की हुक्का बनाने में लगे हुए हैं।

खेलाबन भी दीवाली में लोधियाना से गाँव आ गया है। आजकल रमेसर चचा के चाय के दुकान पर खेलाबन का चर्चा जमकर होता है।

क्योंकि दीवाली के चार दिन पहले से ही नबका चुकभुकिया झालर की रोशनी से उसका मिट्टी का घर जगमग कर रहा है डेक मशीन से बजती गीत उस झालर पर ट्यूनिंग मिलाने का काम कर रही है। मुखिया जी भी उसके दरवाजे पर तीन घण्टा से बैठे उस चुकभुकिया की पहेली सुझाने का काम कर रहे हैं।

ये क्या? मोहल्ले का रजकुमरा का मुहँ मुरझाया दिख रहा है, दो दिन से उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गया है कारण पुरबारी मोहल्ला के पिंकिया दो दिन से डिबिया में तेल डालते डालते परेशान हो गई है।

सुरेसर के पत्नी के तबियत बिगड़ने से उसके डिबिया का तेल भी पिंकी को ही भरना पड़ रहा है जिससे उसका दोनों हाथ दर्द से दुखने लगा है और फूल भी गया है। बेचारा रजकुमरा अपने प्रेमिका का दुःख बांटने का काम कर रहा है।

बच्चे भी अपना हुक्काबाती बनाने में जुट गया है, कलुआ त अपने बाबू के गमछा को फाड़कर हुक्कालोली बना लिया है जिस कारण उसका जमकर कुटाई भी हुआ है।

“रकेस रे देखना, इस बार पूरे गाँव जबार में हमारा ही गेनी सबसे बड़ा रहेगा और जब हुक्कालोली भांजेंगे न तो उसका लाइट बरम बाबा तक पहुंचा देंगे। आ रे रकेस तुम्हारे घर में तेल नहीं है क्या? गुड्डू अपने मित्र राकेस से सारी बातें कर रहा है।

“नहीं रे गुड्डू, बाबू जी अइ बेर तेल नहीं ले पाए। सारा पइसा छोटकिया के इलाज में ख़र्च हो गया”

रे रकेस तुम चिंता नही करो हमारे औऱ तुम्हारे समान में कोई अंतर नहीं है। दूनू दोस एक एक बार फेर करके भांज लेंगे।

इधर, आजकल अखबार सिर्फ इस्तेहार से ढँक गई है कहीं कोई खबर नहीं छपी है पहले पेज से अंतिम तक, सबमें दिवाली की शुभकामना ही छपी है। इस शुभकामना के पीछे तो उसका व्यापारी दिमाग काम कर रहा है। दूसरे पेज पर तो फलाने समान पर 70% तक की छूट औऱ बम्पर उपहार, की बात छपी है, सांतवें पेज पर हीरोइन खुद ही मोबाईल बेच रही है। लग त रहा है कि उस मोबाइल के साथ में अपना पर्सनल नम्बर भी देगी।

चौथा पेज होम लोन बिना ब्याज पर और उसके बगल फलाने रँग से घर को सजाइये, मेरा दिमाग तो तब खराब हो गया जब उसके नीचे लिखा था घर को एल ई डी लाइटों से रौशन करे साथ में दो किलो सोना मुफ्त में पाइए।

मैं कमरे के किसी कोने में सारी बातों पर मन्थन कर रहा हूँ कि “न जाने कितने झुठ सपनों को सजाया जा रहा है दुनिया में सब कुछ ऑफर औऱ उपहार में मिल रहा है” मन में ढेर सवाल पैदा हो रहे हैं।

क्या? वो खुशियां मिल सकती है जो रकेस औऱ गुड्डू के बांटकर हुकल्लोलि भांजने पर मिलता था।

क्या? इस 70% छूट वाले सामान से वो सुहानी सुगन्ध मिल सकती है जो चार दिन पहले से ही गाँव को अपने गन्ध में घोल रही थी।

क्या? उस मुफ्त के उपहार से बुझारण को वो सुकून मिल जाएगा जो जेब में बचे आखिरी पैसा होने के बावजूद रमबतिया और मोहना के कपड़ों की खरीदारी बिना किसी चिंता के किया था कि कल से क्या खाएंगे।

क्या? उस हिरोइन वाले मोबाईल की चर्चा रमेसर चचा के दुकान पर होगी जो खेलाबन के भुक्चुकिया झालर की हुई थी या फिर मुखिया जी वैसे ही उसे देखने के बहाने दरवाजे पर आएंगे।

मैं अक्सर इस ऑफर, उपहार औऱ छूट लुभाने वाले आधुनिक बाजार के पीछे आदमी को भागते देख चिंतित हो जाता हूँ, तुम इस ऑफर में समान ही दे सकते हो। तुम उपहार तो दे सकते हो लेकिन तुम उसके साथ मिलने वाली खुशियां नहीं दे सकते, क्योंकि तुम मनुष्य की क्षणिक चाहतों को समझ सकते हो, उसकी भावनाओं को तुम नहीं समझ सकते हो।

सुने हैं “इस दिवाली पर 30 हजार करोड़ की ऑनलाइन शॉपिंग का अनुमान है” बड़ी गम्भीर समस्या है हमलोगों को ध्यान देना होगा, सोचना होगा ऐसे में लोकल मार्केट्स में रौनक कैसे हो,परचेज पावर खत्म नही हुआ है लोकल मार्केट खत्म हुआ है।

-रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

 

Roshan 'Suman' Mishra
Roshan ‘Suman’ Mishra

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