Tumhe Yaad Ho Ki Naa Yaad Ho | Mid Night Diary | Sumit Jha

तुम्हे याद हो कि न याद हो | सुमित झा

तुम्हें याद हो कि न याद हो,
कि आज की जैसी ही रातों में कभी
कुछ सालों पहले
मैंने तुमसे और तुमने मुझसे
प्रेम किया था!

तुम्हें याद हो कि ना याद हो,
कि इसी अनंत आकाश के नीचे
मैंने तुम्हें और तुमने मुझे
स्पर्श किया था!

तुम्हें याद हो कि ना याद हो ,
कि इन्ही काले बादलों और
चंद टिमटिमाते तारों के नीचे
मैंने तुम्हें और तुमने मुझे
आलिंगनबद्ध किया था!

तुम्हें याद हो कि ना याद हो,
इसी भींगी घास पर
जहां ओस की बूँदे आज भी गिड़ी पड़ी है
मैंने तुम्हारे और तुमने मेरे
गेसू सँवारे थे!

तुम्हें याद हो कि ना याद हो,
कि इसी पहली और
संग ही आखिरी रात जब हम मिले थे
मैंने तुम्हें और तुमने मुझे
बोसा किया था!

तुम्हें याद हो कि ना हो,
इसी एकांत जगह
जहां मैं यह कविता लिख रहा हूँ
मैंने तुम्हें और तुमने मुझे
अंतिम बार जी भर के देखा था!

तो जानां तुम्हें याद हो कि न याद हो,
कि आज की इस अकेली
और दुख भरी रात में
अथाह विरह की पीड़ा साथ लिए
मैं तुमसे उतना ही प्रेम करता हूं !

‘जितना कि मैंने उस पहली मुलाकात से
उस रात में बिताए हर पल को साथ लिए
उस अंतिम क्षण तक जब तुमने मुझे
आख़िरी बार भींगती पलकों के साथ
अंतिम बार देखा था’ से लेकर
आज और अभी भी करता हूं !

तुम्हें याद हो कि न याद हो….

 

-सुमित झा 

 

Sumit Jha
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