तुम्हारी डायरी

तुम्हारी डायरी | आकाश शुक्ला | अस्तित्व

मुझसे बेहतर कौन समझेगा स्मृतियों को, लेकिन तुम्हे भी तो समझना था !

समझना था कि जब कोई एक स्मृति हम पर हावी होती है तो समस्त स्मृतियों को निगलने लगती, अपाहिज बनाने लगती.

तुम्हारी न जाने कितनी स्मृतियों को मैंने संजो कर रखा लेकिन तुम ये समझ ही न सके कि तुम एक दर्द को सहने में कराह रहे थे और मैं तुम्हारे दिए अनगिनत कराहों को समेटे तड़पकर मुस्कुरा रही थी.

अक्सर, या यूँ कहूँ हमेशा तुमने मेरी स्मृतियों की दीवारों को कुरेदा है. उधेड़ कर तुम चले जाते थे और मैं रह जाती थी सब कुछ जान कर भी अनजान…

आज शिकायत करने आयी हूँ,  तुम्हारे सबसे करीब मैं थी फिर मुझे क्यों ऐसे किसी कोने में रख कर भूल गए? जर्जर हो चली हूँ शायद, इसलिए ? या मैं आज तुम्हारी नज़र में कुछ भी न रही…

तो क्या हुआ जो आज मेरे पास तुम्हे समेटने को ताकत नही, लेकिन सिर्फ एक बार देख तो लो जो तुमने मुझे दिया था,अपने सबसे मुश्किल वक़्त में..

वक़्त मिले तो अपना हाथ फिरा कर मुझ पर से ये वक़्त की धूल झाड़ देना !!

तुम्हारे इंतज़ार में..

तुम्हारी डायरी 😊

-‘अस्तित्व’

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