Tumhari Aankhein

Tumhari Aankhein

बातें करना कोई तुमसे सीखे, कुछ न कहकर भी कितना कुछ बोल जाती हो तुम। हर बात को लफ़्ज़ों में कहा जाये ये जरूरी नहीं, और हर बात को शब्दों से बाँध कर कागज़ पर उतरना भी मुमकिन नहीं। तुम्हारा बिना कुछ कहे सिर्फ एक टक देखते रहना ही एक कहानी कह जाता है। और कहीं न कहीं यह बात सच भी है कि जो शब्दों में नहीं होता वो नज़रों में होता है।

लफ़्ज़ों का खामोश होना और फिर उन शब्दों का मिलकर एक कहानी बनाना, इतना आसान भी नहीं आँखों के रस्ते ख़ामोशी का बह जाना। तुम्हारे जाने के बाद ज़िंदगी में कुछ मिला हो या न मिला पर शोर बहुत मिला। अब तो याद भी नहीं आखरी बार खामोश होकर कब किसी की बात को गौर से सुना हो या फिर किसी की आँखों में डूब कर उसके मन की बात पढ़ी हो।

एक अरसा हो गया है, अब यह शोर काटने लगा है, मुझे… अगर तुम सुन सकती हो, सुनो, आ जाओ लौटकर, बस अब तुम्हारी आँखों की ख़ामोशी में खो जाना चाहता हूँ और मैं वो सारी बातें पढ़ लेना चाहता हूँ, जो खामोश तो आज भी हैं पर तुम्हारी आँखों में चीख रही हैं।

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