‘तुम’हारा नाम | अमन सिंह | #बेनामख़त

एक तुम्हारे नाम के सिवाय मेरे पास था ही क्या.. जिसे मैं अपना कहता और आज भी तेरे नाम के सिवाय मेरा है ही क्या जो मेरा है। एक तुम्हारा नाम ही था जिसे खुद से जोड़ने की उम्मीद में सारी उम्मीदें नउम्मीद हो गयी और अब कोई उम्मीद नज़र भी नहीं आती है, मुझे।

आज भी डायरी के उस आखरी पन्ने पर अपने आप ही नज़रें दौड़ जाती हैं जिस पर बड़े ही इत्मीनान से तुमने अपने नाम के साथ मेरे नाम को लिख कर, मेरे नाम की कीमत बढ़ा दी थी। लेकिन अब तो यादों की बारिश में भीगकर वो एक तुम्हारा ही नाम धुंधला सा हो गया है। तुम्हारा नाम कागज की सतह से अब मिटने को ही है, लेकिन मेरी याद से कब मिटेगा वो नहीं जानता। तुम्हारा नाम जनता हूँ फिर भी बस एक और बेनाम सा ख़त तुम्हारे नाम उन अधूरी बातों के साथ जिन्हें मैं किसी से कह नहीं पता।

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