Tum Yahi Ho Paas Mere | Mid Night Diary | Raghv Bharat

तुम यहीं हो पास मेरे | राघव भारत

सुनो !

तुम गर चले गये हो तो ये पायल की झंकार किसकी सुनता हूँ मैं।

ये किसकी बिंदिया हैं जो आईने से मुझे देखती है ।

ये किसकी चूड़ियों की खनक है जो कानो में मिश्री घोलती हैं ।

रसोई में कौन है जो मुस्कुरा कर गले से लग जाता है ।

ये कौन है जो हर जगह घर के हर कोने में साथ है मेरे ।

चादरों की सिलवटों में भी तो तुम्हारी महक है ।

ये किसकी याद है जो सुबह उठा देती है ।

तुम तो यहीं हो गए कहाँ हो ?

और गर चले गए हो तो ,

फिर ले क्या गए हो ?

वो सिन्दूर जो भरा था मांग में तुम्हारी ।

वो दिये की बाती जो जोड़ कर रखती थी हमें।

या वो प्यार जो दिया तुम्हे हमेशा ।

या मेरी आत्मा का अंश ले गए हो तुम।

क्या ले गए हो सोचना कभी जब तन्हा हो ,

भीड़ में कब कहाँ कुछ सोच पाते हो तुम ।

झांकना कभी मेरी आत्मा के अंश में ,

नज़र आयेगा उन नन्ही मासूम आँखों में अक्स मेरा ।

वो आँखे पूछेंगी क्या मैं सिर्फ तेरा हूँ ।

शायद महसूस हो तुम्हे दर्द उसका और मेरा ।

कभी सोचना मुझे मैं क्या हूँ कौन हूँ तुम्हारे लिए ।

नदी कहीं से कहीं बहे मिलना उसे सागर में ही है ,

सागर के सिवा कहीं नहीं है ठिकाना उसका ।

सोचना ……।

वैसे तुम यहीं हो पास मेरे ।

 

-राघव भरत

 

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One thought on “तुम यहीं हो पास मेरे | राघव भारत

  1. अत्यंत खूबसूरत रचना, सादे शब्दों के साथ भी अलग भाव उकेर दिया है आपने।

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