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तुम | सारांश श्रीवास्तव

दबंग और बेबाक हो जाओ तुम
अब आरोप दुनिया पे मत लगाओ तुम

कब तक ज़माने की बातें सहोगी
सच जानकार भी कब तक सच ना कहोगी

क्यों रातों को घर में तुम बंद हो रहती
क्यों बातें ये दिल की तुम किसी से ना कहती

क्यों तुम आज़ाद ज़िन्दगी जी नहीं सकती
क्यों औरो की तरह सिगरेट तुम पी नहीं सकती

क्यों खुद को नाकाबिल समझने लगी हो
क्यों रातों को घुट घुट के रोने लगी हो

क्यों बातें तुम अपनी रखती नहीं हो
क्यों बिंदास कुछ तुम कहती नहीं हो

तुमको सहारे की क्या है जरूरत
दुर्गा भी काली भी तुम सबकी मूरत

खुद को क्यों करती हो इतना दुखी तुम
औरो के सामने क्यों रखती निगाहे झुकी तुम

क्यों डरती हो लोगो से कि ये क्या कहेंगे
ये कभी चुप न होंगे ये कहते रहेंगे

इनकी वजह से जीना छोड़ दोगी क्या
अपनी मंज़िल के रास्ते मोड़ दोगी क्या

अरे चुल्हे में गया अब ये ज़ालिम जमाना
खोल दो अब अपने हौसलों का खजाना

अपने ही रंगों से दुनिया सजाना
तुम्हारे ही नाम होगा ये आने वाला जमाना….

 

 

-सारांश

 

Saransh Shrivastava
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