Tawayaf Ki Beti | Mid Night Diary | Aditi Chatterjee

तवायफ़ की बेटी | अदिति चटर्जी

हर रात घड़ी कि सुई मुझको चुभती है,
ये बेदर्दी रात, ये घूप अँधेरा और माँ का इंतज़ार बढ़ता ही जाता है।

सुरज ढलते ही रोज़ माँ काम पे निकल जाती है,
वो जिस्म नहीं अपनी मजबूरियाँ बेच आती है।

पिछले हफ्ते माँ को जब रात का कहर बताया
तो उसने मेरे लिए नया मख़मल का तकिया बनवाया,

माँ की गोद सा तकिया तो मिल जाता है
पर वो थपथपाते हाथ कहाँ से लाऊँ ?

फैल जाते हैं आँसूू गले तक, ये माँ को कैसे बताऊँ?
बहुत उम्मीदें बाँधे मुझसे

वो पास के बस्ती वाले स्कूल में भेजती है,
अगर बन जाऊँ कुछ तो अपनी भूख मिटाने को किसी की भूख मिटाने की जरुरत नहीं, माँ ऐसा सोचती है।

एक रोज़ जो ‘अदार्श’ पर लेख लिखने को कहा था,
मैंने पन्ने भर भर नाम माँ का लिखा था,

देख उसको माँ अजीब सा घबराई,
जड़ दिया तमाचा और गले भी लगायी।

‘कौन हैं पापा तुम्हारे?’
दूसरे बच्चों ने मेरा बहुत मज़ाक उड़ाया,
क्यूँ पुछूँ मैं पता उनका जब माँ ने हर किरदार निभाया।

यूं कलेजे के टुकड़े को छोड़ जाना
आसान नहीं होता होगा,
रोती होंगी शायद बिस्तर कि सीलवटें भी
जब मजबूरीयों से लिपटी मेरी माँ को कोई ‘तवायफ़’ कहता होगा।

 

 

-अदिति चटर्जी

 

Aditi Chatterjee
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One thought on “तवायफ़ की बेटी | अदिति चटर्जी

  1. माँ माँ है इसका मोल कोई नहि चुका सकता, माँ के क़दमों तले जन्नत है।

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