Tag: Sumit Jha

Poetry

दीवारें | सुमित झा

मेरे कमरे की दीवारें मुझे जकरने लगी है। और अंधेरा मुझे डराने लगा है। बिस्तर की चादर मुझे बांधने लगी है। यहाँ का सन्नाटा अब चीख़ने लगा है। मेरी किताबें चिल्लाने लगी है। सिगरेट ख़ुदContinue reading

Tumhe Yaad Ho Ki Naa Yaad Ho | Mid Night Diary | Sumit Jha
Poetry

तुम्हे याद हो कि न याद हो | सुमित झा

तुम्हें याद हो कि न याद हो, कि आज की जैसी ही रातों में कभी कुछ सालों पहले मैंने तुमसे और तुमने मुझसे प्रेम किया था! तुम्हें याद हो कि ना याद हो, कि इसीContinue reading