स्वीट कॉर्न्स | अमन सिंह | #एंडलेसजर्नीऑफ़ मेमोरीज

एक बार फिर से माँ से झगड़ा करके राधिका गुस्से में घर से बाहर आ गयी। जनवरी की कडकडाती सर्दी में वह गाड़ी लेकर सड़क पर आ तो गयी लेकिन जाये तो जाये कहाँ.. इस फैसले में ही उसने घर के नज़दीक की रेड लाइट पर लगभग १० मिनट गुजार दिए।

वैसे उसके माँ पापा ने बचपन से उसकी किसी चीज में कमी नहीं रखी थी लेकिन जब से राधिका के माँ पापा का तलाक हुआ था, तब से वह कुछ जयादा ही चिडचिडी रहने लगी थी। अब तो उसे हर छोटी बात पर गुस्सा आ जाता था।

खैर गुस्से भरे दिमाग और तेज रफ़्तार के साथ राधिका ने गाड़ी का स्टेयरिंग अपने पसंदीदा जगह किंग्स ऑफ़ हैवन की तरफ मोड़ दी। चंद ही मिनटों में राधिका अपने पसंदीदा जगह और पसंदीदा बेंच पर थी, लेकिन उसका गुस्सा अभी उतरा नहीं था। भगवान ही जाने उसके गुस्से का शिकार कौन बनेगा।

“जा भाई आज तो तू ही झेल इन लाड साहिबा को…” एक साथी वेटर ने सूरज से कहा। साथ ही मेनेजर ने भी सूरज की तरफ देखकर उसे ही जाने का इशारा किया। अब उसके पास और कोई आप्शन तो था नहीं, सिवाय राधिका के पास जाने का..

“मैं आर्डर प्लीज” सूरज ने टेबल के पास पहुँच कर डरते हुए कहा।
“वन मलाई किंग, फुल प्लेट रोस्टेड चिकेन एंड वन मिडिल पेग ऑफ़ रम..” राधिका ने बिना सूरज की और देखते हुए कहा।

सूरज ने मेनेजर की और देखा जो हाथ जोड़ उसी की तरफ देखे जा रहा था। काहिर सूरज ने हिम्मत करके कुछ कहना चाहा लेकिन फिर वापस काउंटर पर आ गया। उसने काउंटर से एक कटोरी में कुछ स्वीट कॉर्न्स लिए और वापस राधिका की टेबल के पास आ गया।

उसने पास पहुँचते ही कहा, “वी आर सॉरी मैंम, बट इट्स टू लेट सी, आज आपका पसंदीदा मेनू तो नहीं मिल पायेगा, बस यह स्वीट कॉर्न्स ही बचे हैं।”
राधिका ने गुस्से में सूरज की तरफ देखा लेकिन कुछ कहा नहीं, और जैसे ही सूरज वापस लौटने के लिए मुड़ा राधिका ने टेबल पर रखे स्वीट कॉर्न्स पर जोर से हाथ मारते हुए उन्हें जमीन पर गिरा दिया और गुस्से में वहां से निकलकर बाहर आ गयी।

राधिका के शोर मचाते कदम अपने पीछे एक सन्नाटा छोड़ गए। बाहर निकलते वक़्त राधिका ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। काहिर राधिका के जाने के बाद सूरज पलटकर काउंटर के पास आ गया। थोड़ी देर बाद मेनेजर ने सूरज के पास आकर कहा, “डोंट बी सॉरी सूरज, इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है, राधिका जी का तो हर दुसरे दिन यही काम है। तुम अभी नए हो इसलिए तुम्हे अभी कुछ पता नहीं है। जैसे जैसे वक़्त गुजरेगा तुम्हें सब पता चल जायेगा।”

वहां से निकलने बाद राधिका का गुस्सा शांत हो गया और उसे अपनी गलती का एहसास भी हुआ। जाने अनजाने में उसने शायद कुछ गलत कर दिया था। वह कुछ सोच लौटने को जैसे ही पलटी उसके अहम ने उसके बढ़ते क़दमों को रुकने पर मजबूर कर दिया। लेकिन कहते हैं न कि दिल अपनी बात किसी न किसी जरिये कर ही देता है।

राधिका न ही उस जगह पर वापस लौटी और न ही घर वापस गयी। उसने स्टोर पर लगे शीशे से झाँक कर देखा, सूरज अभी बिखरे हुए स्वीट कॉर्न्स ही उठा रहा था, उसे देख राधिका को बुरा लगा, उसने कुछ सोचा और फिर अपनी कार में जाकर बैठ गयी। थोड़ी देर के बाद उसने कार पास के ही बस स्टैंड के नजदीक कड़ी की और कार में बैठ, सूरज के बहार आने का इन्तजार करने लगी।

खैर बीतते वक़्त के साथ कुछ देर बाद सूरज वहां से बहार निकल आया और रोज़ की तरह ही बस स्टैंड पर जाकर बस का इन्तजार करने लगा। कुछ समय के बाद उसकी नज़र पास खड़ी कार में बैठी राधिका से जा मिलीं, जो उसी की और देख उसी का इन्तजार कर रही थीं।

राधिका को देख सूरज हल्के से मुस्कुराया लेकिन अभी कुछ देर पहले ही हुए वाकिये को याद कर दो कदम पीछे हट गया, ताकि राधिका उसे देख न पाए। वहीँ दूसरी ओर अपनी कार में बैठी राधिका यह सोच रही थी कि वह कैसे जाकर सूरज से बात करे, कैसे उसे बताये कि उसने जो भी किया, गुस्से में किया। वह अपनी गलती मान गयी। यह कैसे बताये वह सूरज को..

वह कुछ देर सोचती रही और फिर हिम्मत करके कार से उतर सूरज की तरफ बढ़ गयी। वह जैसे ही सूरज की तफ़र बढ़ी बस आ गयी। राधिका ने सूरज को देखा और सूरज ने राधिका को लेकिन राधिका कुछ कहती वैसे ही बस चलने को हुई तो सूरज बस में बैठ गया। दोनों जाते हुए एक दूसरे को देखते रहे।

अगली सुबह राधिका जब सो कर उठी तो उसने देर न करते हुए तैयार होकर किंग्स ऑफ़ हैवन का रुख किया लेकिन फिर भी उसे पहुँचने में ११:३० बज गए। ठीक ११:३० बजे राधिका फिर से पिछली रात की तरह उसी जगह उसी सीट पर थी लेकिन फर्क सिर्फ इतना था कि वक़्त बदल गया था और राधिका का मूड भी…
अब वह गुस्सा नहीं थी। राधिका के पहुँचते ही स्टोर में जैसे हलचल सी मच गयी। सवाल यह था कि उसके पास जायेगा कौन आर्डर लेने के लिए..

मैनेजर कुछ कहता या कोई और मजबूरी में आगे बढ़ता सूरज ने खुद ही जकात=र मैनेजर से कहा, “सर, डोंट वरी मैं जाकर अटेंड करता हूँ मैं को..” सूरज ने राधिका के पास पहुँचते हुए एक मुस्कान के साथ कहा, “गुड मोर्निंग मैंम, वन मलाई किंग, फुल प्लेट रोस्टेड चिकेन एंड वन मीडियम पेग ऑफ़ रम… आज आपका मेनू बिल्कुल रेडी है। बस १० मिनट मैं अभी लेकर आता हूँ।”

सूरज ने इतना कहकर बिना राधिका का जवाब सुने नोटपैड पर कुछ लिखा और मुड़कर जाने लगा। राधिका ने अभी भी कुछ नहीं कहा था। लेकिन सूरज जैसे ही मुड़कर कुछ दूरी पर पहुंचा, राधिका ने उसे पीछे से टोकते हुए कहा, “एक्सक्यूज मी, आज वो स्वीट कॉर्न्स मिलेंगे क्या?”

सभी राधिका की बात सुनकर हैरान थे। राधिका को इतने प्यार से बोलते हुए शायद पहली बार ही सुना था, स्टोर के लोगों ने.. आखिर स्वीट कॉर्न्स की डिमांड होते ही सूरज ने देर नहीं की और चेहरे पर एक बड़ी ही स्माइल लाते हुए जवाब दिया, “स्योर मैंम, जस्ट फ्यू मिनट्स ओनली…”

कैर हर बार की तरह इस बार भी राधिका जाते वक़्त टिप छोड़कर जाना नहीं भूली, लेकिन जब सूरज ने टेबल से पेमेंट के साथ टिप उठाई तो वह देखकर वह दांग रह गया। एक नोट पर कुछ लिखा था, उसने पढ़ा ” सॉरी फॉर लास्ट नाईट… मैं तुम्हारा पास के ही बस स्टैंड पर इन्तजार कर रही हूँ, क्या हम मिल सकते हैं?”

लेकिन सूरज सब भूल फिर से काम पर लग गया पर जब वह शाम को बहार निकला तो उसने देखा राधिका अभी भी उसका इन्तजार कर रही थी। लेकिन क्यूँ यह सवाल सूरज के ज़हन में आया, जिसके जवाब की तलाश में वह राधिका की और बढ़ गया।

“सॉरी सूरज.. कल रात के लिए…” राधिका ने कहा लेकिन सूरज ने उसकी बात बीच में काटते हुए बोला, “कोई बात नहीं… उस बात को तो मैं कब का भूल गया.. डोंट वरी अबाउट दैट…”

सूरज के अच्छे व्यवहार की वजह से राधिका थोड़ी सहेज हो गयी, उस शाम दोनों ने ढेरों बातें की.. अगर कोई उन्हें देखता तो यही सोचता मानों दोनों एक दूसरे को पहले से जानते हों। उन्हें देखकर यह बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता कि वह उस्न्की पहली मुलाकात थी। धीरे-धीरे दोनों की मुलाकातों का दौर कुछ यूँ चला कि बस और कार के बीच का फासला चार क़दमों के पैदल सफ़र पर आ गया। अब हर शाम राधिका का वक़्त किंग्स ऑफ़ हैवन में ही गुजरता।

सूरज भी यही कोशिश करता कि वह किसी न किसी बहाने से राधिका के आस पास ही रहे। कडकडाती सर्दी में भी दोनों घंटों पैदल चलते हुए, बात करते हुए वक़्त गुजारते। शाम को राधिका पास ही सूरज का इन्तजार करती और सूरज के आ जाने के बाद दोनों एक लम्बी वाक पर निकल जाते।

वैसे अब तो दोनों ही इस बात को समझ चुके थे कि उनके दिल में क्या है? लेकिन कई बार ख़ामोशी काम नहीं आती, कई बार ख़ामोशी को तोड़ने के लिए दो अल्फाजों का दखल बेहत जरूरी होता है। बस उसी ख़ामोशी को तोड़ने की चाहत में एक शाम राधिका ने सूरज के सामने अपने दिल की बात कह दी।

राधिका ने अपने साथ आया गुलाब सूरज की ओर बढाते हुए घुटनों पर बैठकर कहा, “सूरज जब से तुमसे मिलीं हूँ, मैं मैं नहीं रही… जिंदगी में एक नई सी चमक आ गयी है। अब मैं वो राधिका नहीं रही जो उस रात तुम्हें गुस्से में मिली थी। मैं वो राधिका हूँ जो तुम्हें दिल दे बठी है, तुमसे प्यार करने लगी है। तुमने, तुम्हारे प्यार ने मुझे बदल दिया है।”

“अच्छा तो तुम बदल गयी हो…??” सूरज ने तुरन्त ही पूंछा।
राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया। सूरज ने आगे कहा, “जैसे मेरे मिलने से तुम बदल गयी, इस बात का क्या भरोसा कि मुझसे बेहतर मिल जाने पर तुम बदलोगी नहीं। क्या पता तुम फिर बदल जाओ और मुझे..”

सूरज अभी बोल ही रहा था कि राधिका के हांथों से फूल गिर गया और वह मायूस होकर जाने लगी कि तभी सूरज ने उस गुलाब के फूल को उठाया और दौड़कर राधिका को पीछे से गले लगा लिया। उसका अनकहा, अनुउल्झा प्यार देख राधिका की आँखों में कुछ मोती आ गए।

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