Surakshit Aawaran | Mid Night Diary | Surbhi Anand

सुरक्षित आवरण | सुरभि आनदं

मैं ख्वाबों में हूँ, आकर मेरी कुछ पंक्तियां
गुनगुना तो लो,
मैं शहर के भीड़ में तन्हा हूँ,
सामने मुखातिब हो
मेरे चेहरे पर मुस्करा तो दो !

इस अल्हड़ नजर ने
एक परिपक्व नजर से दो टूक बाते की
पर, हकीकत
उसके नैनों के ख्वाब
रोज रात बरबस मुझे ही दिखते !

अगलगी-सी, अनकही-सी
दिल में कमसिन-सी दास्तां है
और तू ठहरा इक खाली कमरा
तभी तो अंदर मैं सज्जा बनना चाहती हूँ !

नसीब है क्या, ओ मेरे आका
गुलाम बनूँ क्या, तेरी शोहरत पर
चवन्नी की तारीफ है मेरी
पर, तूझे पाकर
रुपये बनने की हिरस हुई !

आखिर शीर्षक बन गई
तेरे शब्दों की जज्बात से !!

 

-सुरभी आनंद

 

Surbhi Anand
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