शर्दी की एक शाम | सारांश श्रीवास्तव

सर्द मौसम था और हवा भी चुभने लगी थी अब, हालाँकि ये चुभन अच्छी भी लगती है। कोहरा और कोहरे को चीरते हुए रोज़ तुमतक आने का सुकून भी कुछ और ही होता है।

रोज़ सुबह तुम्हे फ़ोन करके उठाने का भी अलग ही सुकून है और तुम्हारी आधी जगी आधी सोई आवाज़ से मेरे दिन की शुरुवात होना अब इससे बेहतरीन शुरुवात और क्या होगी??

हर सुबह यूं लगता जैसे तुम्हारी और मेरी आवाज एक हो गई हो, आधी जागी आधी सोई हुई सी तुम और आधा जागा आधा सोया हुआ सा मैं।

चुभती हवा , उगता सूरज और हमारा इस तरह मिलना कितना पाक एहसास होता है और वो पल पाकीज़ा। यूं ही एक रोज, बात करते करते तुमने आहिस्ता से मेरी ऊँगली थामी, तुम्हारा स्पर्श बड़ा सुखद होता है पर इस बार तुम्हारा हाथ मुझे कुछ गर्म सा लगा, वो गर्माहट नार्मल नहीं थी तो पूछ ही बैठा मैं कि- अच्छा क्या हुआ है तुम्हे??

हर बार की तरह तुमने भी कहा- कुछ भी तो नहीं मैं तो नार्मल हूँ। ….पर मैं तुम्हे तुमसे भी बेहतर जनता हूँ, तुम्हे हल्का सा बुखार होगा, आँखे भी कुछ भारी लग रही होंगी, और सर भी थोड़ा दर्द दे रहा होगा, बदन भी दर्द से टूट रहा होगा।  मैं समझ गया था तुम्हे, तुम्हारे ना कहने पर भी।

बात को कही दूसरी जगह ले जाने के लिए मैंने कहा- चलो नाश्ता करते हैं। सुबह सुबह चाय की चुस्की तरोताजा कर देगी, इस आस के साथ एक कट चाय और एक पोहा लिया, पर कम्बख्त मिलावट हद से ज्यादा थी और चाय में पानी के सिवा कुछ भी नहीं था।

सुबह के करीब 8:30 बज गए होंगे और वही भाग दौड़ भरी दुनिया में भाग दौड़ चालू हो गई थी। जानता हूँ, कि तुम्हे दवाई पसंद नहीं और तुम्हारी लापरवाही भी कुछ कम नहीं, थोड़ी अलसी भी हो तुम, सोच रहा था कि, ऐसा क्या कर सकता हूँ कि तुम्हे आराम मिले, बुखार से, बदन दर्द से, सर दर्द से, फिर जवाब यही मिला कि तुम्हे दवाइयां तो खिलानी ही पड़ेगी।

चाँद की आगोश में जाते सूरज के साथ-साथ मैं तुम्हारे पास आने लगाता हूँ, रोज़ की तरह। मेडिकल स्टोर से तुम्हारे लिए दवाइयां ले ली थी, ये जानते हुए भी कि तुम्हे नहीं पसंद ये गोलियां ।

3 दिन का कोर्स था दवाइयो का, तारीख के हिसाब से मैंने छोटी छोटी पुड़िया में दवाइयां रख दी थीं। फिर तुमतक पंहुचा, तुम्हे आज रात की गोली खिलाई और आराम करने को कहा, जनता हूँ पढ़ाई का लोड थोड़ा ज्यादा रहता है, पर सेहत को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता, तुम्हारी पढाई के आगे आजतक कहाँ कोई आ पाया है, ये तो आराम ही था इसकी क्या मजाल। ये जानते हुए कि तुम आराम नहीं करने वाली हो, मैं माना नहीं, कह ही दिया कि- अच्छा सुनो थोड़ा आराम जरूर कर लेना । कुछ घंटों बाद तुम्हारा text मैसेज आता है कि-” मैं जानती हूँ तुम्हे मेरी परवाह है, पर अगली बार से जब भी गोलियां लाओ तो मुझसे पूछकर लाना, इन गोलियों से मेरे पेट में दर्द होता है”

मैं कहीं न कहीं खुश इस बात के लिए था कि- तुम अब सब कुछ साफ़ साफ़ कहने लगी हो, जो मुझे बहुत अच्छा लगता है। हक़ तो तुम्हारा हमेशा से ही था और तुम्हारा ही है।

मेरे चेहरे की मुस्कराहट थम नहीं रही थी और मैं मन ही मन कह रहा था कि- तुम्हे बस जल्द से जल्द ठीक कर दूं, तुम पूरी तरह स्वस्थ हो जाओ और फिर हम खा सके हॉटडॉग और गोलगप्पे मस्त वाले। तुम मेरे लिए कोई मौका नहीं मेरी जिम्मेदारी हो और तुम्हारा ख्याल रखना मेरा फ़र्ज़, मेरा प्यार या चाहे जो कह लो।तुम जल्द से जल्द ठीक हो जाओगी। मैं तुम्हे जल्द से जल्द ठीक कर दूंगा। तुम्हारी जरा सी तकलीफ से भी मुझे तकलीफ होती है। तुम्हारा ख्याल रखने के लिए मैं हूँ हमेशा से तुम्हारा अपना सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा….

 

 

-सारांश

 

Saransh Shrivastava
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