Shahrikaran - Vardaan Ya Shraap | Mid Night Diary | Raushan Suman Mishra

“शहरीकरण” वरदान या शाप? | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

गाँव के पुरबारी मोहल्ले में एक नरायण बाबू थें। कहा जाता है कि गाँव की सत्तर फीसदी जमीन उनकी ही थी। यही नहीं गाँव के दस कोस में उनके सम्पति के बराबर वाला कोई नहीं था, मतलब पूरे दसकोसी के सबसे बड़े जमींदार माने जाते थें। इस वजहों से पुरे इलाका में उनकी तूती बोलती थी।

नरायण बाबू के परिवार में उनके अलावा उनकी पत्नी और उनका एकलौता बेटा(गुलशन बाबू) था। अब गुलशन बाबु एकलौते थें तो लार प्यार ज्यादा होना भी स्वभाविक था। गुलशन बाबू जब छोटे ही थें, तो एक दिन अपने उम्र के बच्चों के साथ खेलने निकल क्या गए यह देख नरायण बाबू का गुस्सा आसमान चढ़ गया।

और उन सारे बच्चों के घर जाकर उसकी शिकायत दर्ज कराऐं “तुम सब अपनों बच्चों को समझा दो कि मेरे बेटे से अलग रहे, अपने ही तरह मेरे बेटे को बर्बाद करना चाहते हैं औऱ हाँ कह दो कि औकात में रहे, जाहिल गंवार कहीं के”।

इधर नरायण बाबू गुलशन बाबू को हमेशा समझाते कि “गाँव के लड़कों से अलग रहिये, वे सब गरीब हैं उनके बाप भी नौकर चाकर हैं वे सब भी नौकर चाकर बनेंगे, लेकिन आपको तो डॉगडर, इंजीनियर आ कलक्टर बनना है ना”

इस तरह कुछ दिन बीतने के बाद उनकी बातों का असर गुलशन बाबू पड़ ऐसे हुआ कि वे अपने से बड़े उम्र के लोंगो को दोस्त बनाने लगें, इसी बीच एक दिन स्कूल मास्टर गंगानाथ ने गुलशन को उसकी गलत हरक़तों की वजह से पिटाई कर दी। फिर क्या था, अगले दिन पूरी फौज के साथ नरायण बाबू स्कूल को घेर लिएं गंगानाथ मास्टर को मारने के लिए फिर जैसे तैसे बात को पंचायत में निपटाया गया था।

लाड़ प्यार में बहस चुके गुलशन बाबू की चर्चा अब तो गांव के सारे चौक चौराहे पर हो रहे थे। जैसे तैसे दशवीं और बारहवीं की परीक्षा भी उतीर्ण कर लिए। नरायण बाबू की इक्षा के अनुसार इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए गुलशन को विदेश भेज दिए। इंजीनियरिंग के बाद वहीं नौकरी भी मिल गई।

फिर वहीँ किसी अंग्रेजन से शादी भी कर लिए उसके बाद फिर गाँव आने का नाम तक नहीं लिया। बेटे के इन्तजार नरायण बाबू की जिंदगी अब बुढ़ापे को प्रवेश कर चुकी थी इसी वियोग में नरायण बाबू की धर्मपत्नी भी एक दिन इस दुनिया को छोर कर चल बसी। अब बेचारे नरायण बाबू अकेले हो गए थें। कोई देखने सुनने वाला नहीं था, बार बार बेटे और बहु को तार भेजते लेकिंन जब उधर से कोई जवाब नही आता तो मायूस हो जाते।

नारायण बाबू न जाने क्या क्या सोचते होंगे उस विरान हवेली में अकेले बैठे हुए… आखिर जो इतना सम्पति अपने प्रताप से बनाया उसका भी नाश हो जायेगा। फिर क्यों बनाये ये हवेली। क्यों बढ़ाया इतना सम्पति, क्यों बनाया इंजिनियर, क्यों भेजा विदेश? उनकी किये करतूते ही आज उनसे बदला ले रही थी। कम से कम अपने उन दिनों में लोगों से मेल मिलाप, सुख – दुःख में सरिक होते तो ये दुर्दिन नहीं देखनी पड हती. इस आखिरी पल में कम से कम दो चार लोग भी तो उनके दरवाजे पर आकर उनके दुःख बांटने की प्रयास करते।

इस सब के बीच एक दिन नरायण बाबु इस दुःख की पोटरी को संभाल नही पाएं और अपनी सारी विरासत, धन-सम्पति को बिना किसी को सुपुर्द किये चल बसे। गाँव के लोगो उनकी मृत्यु की खबर तब हुई जब उनकी शव की गंध आस प्रोस में फैली। फिर पुरे गाँव वालों के द्वारा उनका श्राद्ध क्रिया कर्म किया गया. आखिरी तक अपने बेटे के इन्तजार में पड़े रहे बेचारे।

क्या ये कहानी सिर्फ नरयाण बाबु की है? नहीं ! क्या आपको नहीं दिखता कि ऐसी घटना दो-चार दस लोग आपको हर गाँव,हर टोले-मोहल्ले में हो रहे हैं? कुछ दिन पहले यह खबर भी तो आई थी मुम्बई के किसी फ्लेट में बेचारे दम्पति की लाश मिली थी। आज देख रहे हैं कि हर शहर में धड़ल्ले से एक पर एक नई बिल्डिंग बन रही है। लोगों के अंदर शाहरीकरण नामक संक्रामक बिमारी तेजी से फ़ैल रही है। लोगो को अब गाँव रास नहीं आते। अब तो लोगों को शहर की कृत्रिम चमक खींच रही है।

समस्या गंभीर है हमे अपने बच्चे को अपने भाषा,संस्कृति,संस्कार और संवेदना से अवगत कराना होगा, उसे समाज के समरसता में बंधना होगा, अन्यथा वह दिन भी दूर नहीं जब हमारा हाल भी उसी नरायण बाबू की तरह हो जाएगा।

 

-रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

 

Raushan Suman Mishra
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