Sawapan | Mid Night Diary | Surbhi Anand

स्वपन | सुरभि आनदं

हवाओं में सन्नाटा
धरती मेरे तले से गुम
शायद तू आ रहा…

केवड़ों की भीनीं-सी खुशबू
पहचान गई तुम्हें
कदमों की सरसराहट
भाँप गई तुम्हें

आँखें एैसे खुली थी,
जैसे इनकी ओस को
सिर्फ तुम्हारी हथेली का इंतजार है,

तेरे नाम का मोती
एक-एक कर लड़ियों में पिर गए
मैं इसी के बूते
तुम्हारे विश्वास में हूँ

 

-सुरभी आनंद

 

Surbhi Anand
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One thought on “स्वपन | सुरभि आनदं

  1. तीसरे अनुच्छेद की तीन पंक्तियों में जैसे पूरी कहानी कह डाली हो! सुंदर रचना। ❤️

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