Samvedanheen | Mid Night Diary | Amisha Tripathi 'Biharan'

संवेदनहीन | अमीषा त्रिपाठी ‘बिहारन’

आज मैंने हिन्दी में लिखा और वो इसलिए कि ये बस भोजपुरिया समाज के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए है।आज मुझे इस बात से दुःख हो रहा है कि मैं इस कलियुग का हिस्सा हूँ।

आज किसी ने एक पोस्ट शेयर किया था जिसमें एक 19 साल की लड़की का गैंगरेप किया गया है और उसका पिता मेडिकल व प्रशासनिक सहायता की दुहाई दे रहा है। मैं जब से देखी हूँ तब से सदमे में हूँ, नहीं संभाल पा रही हूँ खुद को, नहीं समझा पा रही हूँ अपने मन को, नहीं शांत कर पा रही हूँ अपने दिमाग को, नहीं रोक पा रही हूँ अपने आँखों से बहते आँसू को। सवाल अपने आप से है, किसी और से पहले।

क्यों हैं ऐसे लोग? क्या वो लोग भी हमारे अगल-बगल रहते हैं? हमसब के बीच में ऐसे भी लोग रहते हैं? बस यहीं सब सवाल है अपने आप से, किसी और से शिकायत क्या करना?

आगरा में किसी लड़की के साथ गैंगरेप हुआ है, परिवार गरीब है, सही से इलाज नहीं करा पा रहा है। मैं उस लड़की का वीडियो देखी वो परेशान है, उसे बेचैनी हो रही है, उसे घुटन हो रही है और मैं उसको फील कर रही हूँ कि क्या चल रहा होगा उसके भीतर, किस तकलीफ में है वो, उसे जीने का मन नहीं कर रहा होगा, उसे लग रहा होगा कि अब कितना तकलीफ झेलूँ मैं? ओह्ह क्यों, क्यों ऐसे लोग हैं, क्यों देते हैं इतना तकलीफ लड़कियों को? क्यों उनके भीतर ममता नहीं है?

क्यों किसी के हँसते हुए चेहरे को मुरझा देते हैं लोग? बात बस इस केस की नहीं है, हर जगह यहीं हो रहा है। बस मुद्दे अलग-अलग हैं लेकिन पिस रहीं बस लड़कियां ही हैं, उन बेचारियों का तो कोई कसूर भी नहीं है फिर उस टाइम पे क्यों नहीं खुलती लोगों की आँखें, रोड पे सरेआम रेप हो रहा है और लोग आते-जाते देख रहे हैं। एक बार तो सोचिये उनके दर्द को, एक बार तो उन मासूमों को जीने का मकसद दीजिये, कम-से-कम एक तो नेक काम कर दीजिए, कम-से-कम किसी एक माँ की तो लाज बचा लीजिए।

ऐसे ही लोग के बीच हूँ न मैं? फिर क्यों हूँ? नहीं होती तो ठीक रहता, कम-से-कम इतनी तकलीफ तो नहीं होती, रोज-रोज एक नई लड़की की हालात देख के रोना तो नहीं होता। मैं क्यों नहीं हूँ सबकी तरह? क्यों मैं ये सब देख के बर्दाश्त नहीं कर पाती? क्यों मुझे घुटन होने लगती है इस जिंदगी से? शायद वजह यहीं है कि मैं एक लड़की हूँ, मैं भी उन तमाम लड़कियों जैसी ही हूँ जिसकी किसी-ना-किसी दिन मौत से दोस्ती हो रही है,

शायद मैं वो भी हूँ जो उनकी तकलीफों को अपना तकलीफ समझ रही हूँ, शायद मैं वही हूँ जो ये सोचती हूँ कि किसी को बचाते-बचाते मैं खुद खत्म हो जाऊं।

लोग जब ऐसी खबरों वाली पोस्ट देखते हैं या फिर लिखते हैं तो ये बिल्कुल नहीं सोचते कि उस लड़की पे क्या बीत रही होगी? वो तो बस ये सोचते हैं कि इनके शासन में ये होता है, उनके शासन में ये नहीं होता था। मेरा सवाल उन सब लोगों से है जब आप ये सब लिखते हैं तो आपका मन नहीं कहता कि अरे रुक जाओ यार एकबार उस लड़की की तकलीफ तोह देख लो, एक बार उसके जख्म तोह देख लो, एक बार उसका ये सोचना कि अब जीना बोझ है, इस तड़प को तो देख लो।

जवाब शायद ये होगा कि क्यूं देखूं मेरी क्या लगती है? मुझे तो अभी पार्टियों के लिए लड़ना है, खैर क्या बोलूं..

कल एक न्यूज़ देखी बक्सर का तो यहीं सोच रही थी कि लोगों की अंतरआत्मा गवाही दे देती है ऐसे काम करने को? उनको ये नहीं लगता कि किसी के हँसते हुए संसार को उजाड़ रहे हैं? कुछ लोग मिल के उस लड़के को ट्रेन से बाहर फेंक दिए, उसका दोष यहीं था ना कि वो उनकी गैरवसूली का एक विडियो बना लिया था?

और ताज्जुब उनलोगों पे भी है जो बैठे-बैठे तमाशबीन बने रहते हैं, लोग इतना प्राइवेट हो गए हैं? किसी कि तकलीफ नही देख पाते? ये भूल जाते हैं कि कल ये हमारे साथ भी हो सकता है। ये नहीं सोचते कि जब हमारे साथ होगा तो कौन आगे आएगा? हो सकता है जिसके साथ आज कुछ गलत हुआ, कभी वो भी चुप्प तमाशबीन रहा हो और हमारी आज की चुप्पी भी हमें कभी उसकी जगह पर ला के खड़ी कर दे।

ऐसे लोग भी है जिन्हें कोई मतलब नहीं है, होने दो जो हो रहा है, हमारा क्या जा रहा है? हमारा काम तो विडियो बनाना है, चलो वो कर लेते हैं, सोशल साइट पे फेमस जो होना है। अगर कहीं कुछ गलत हो रहा है और आप देख रहे हैं तो कोशिस तो कीजिये एकबार मदद करने की, आगे तो आइए। अगर आप 10 जुट जाएं तो मजाल किसी की जो हाथ लगा दे।

बहुत लोग इसे पोलटिकल पार्टीज से जोड़ेंगे, बात यहाँ पोलटिकल पार्टी की नहीं है कि कौन है कौन नहीं? बात यहाँ लोगों के सोच की है, इंसानियत की है, जमीनी स्तर पर तो हम जी रहे हैं ना, पार्टीज तो नहीं? मेरा यहीं मानना है कि पार्टी कोई भी हो उसे बस अपनी जिम्मेदारी याद रखनी चाहिए और हमें हमारी।

डॉक्टर को ये याद रखना चाहिए कि उसके सामने कोई मरीज है जिसको ठीक करना उनकी जिम्मेदारी है, प्रशासन को ये याद रखना चाहिए कि जनता की सेवा करना उसकी जिम्मेदारी है और दोषी को सजा देना उनका फर्ज़, भले ही सामने कोई हो।

 

-अमीषा त्रिपाठी

 

Amisha Tripathi
Amisha Tripathi

274total visits,1visits today

Leave a Reply