सामाजिक कैद | अदिति चटर्जी

कभी इधर- कभी उधर, उफ्फ्फ! आज तो नींद ही नहीं आ रही। आए भी तो कैसे, इतने दिनों से इंतज़ार था स्वतंत्रता दिवस के आने का, 2 साल हो गए हैं क्लासिकल वोकल संगीत सीखते हुए मगर कल पहली बार लोग सुनेंगे मुझे। समझ नहीं आ रहा था कि उत्सुक्ता ज्यादा है या घबराहट, तरह तरह के लोगों की तरह तरह की प्रतिक्रिया सोच कर ये रात गुज़ार रही थी।

कभी आँखे बंद कर के कभी घड़ी की ओर एक टक लगाए, जैसे-तैसे गुज़री ये रात। आँखे खुली तो घड़ी में 5:०० बज रहे थे, एक झटके से उठ के बैठ गाई। ‘अरे शाबाश! आज तो अलार्म की जरुरत ही नही पड़ी’ सोचकर मुस्कुरायी, खैर इसका कारण तो मैं जनती ही थी। सफ़ेद सूट जो खास इस दिन के लिए सिलवाया था, पहनकर तैयार हो गायी।

माँ ने जैसे ही गाल के नीचे टिका लगाया मैं समझ गयी मैं कैसी लग रही, माँ तारीफ़ कभी नहीं करती पर ज़ाहिर करने का तरीका अनोखा है। पर अभी वक़्त कम था माँ को बताने का कि उनका अंदाज़ मुझे कितना भाता है इसलिए एक ज़ोरदार झप्पी दी और पापा के साथ निकल गायी। 8:०० बजे कॉलेज की ‘रेपोर्टिंग टाईम’ थी। पापा को क्लब को निकलना था तो कॉलेज के मेन गेट पे मुझे उतारकर वो आगे चले गए।

पहुँच कर मैंने थोड़ी तैयारी कर ली ताकि लोग अच्छा नहीं तो कम से कम बुरा न कह सके। कुछ देर बाद माननीय डिप्टी सी.एम पधारे,ज़ो आज के मुख्य अतिथि थे, साथ में हमारे ज़िले के सारे बड़े अधिकारी भी आए। मुख्य अतिथि द्वारा झंडारोहण के बाद कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। मेरी बारी जितनी क़रीब आती, मेरी शिकन उतनी ही बढ़ती जाती।

कुछ नृत्य प्रस्तुति के बाद मेरा नाम पुकारा गया, दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था, गला सूखा जा रहा था, मैं डर रही थी। पर मंच पे चढ़ने पर एहसास हुआ कि अब डर तो कुछ बदल नही सकता पर बिगाड़ जरूर देगा। डर को मुस्कान तले दबा के मैंने गाना शुरू किया ‘धन्नो धान्ने पुष्पे भोरा…..’। खो गयी थी गाते हुए, होश न रहा कि इतने लोग बैठे हैं सामने, तालियों की आवाज़ ने मुझे बहार निकाला।

समाप्त कर मैंने ‘जय हिन्द’ का नारा लगाया और मंच से उतर गई। दोस्तों कि प्रतिक्रिया ने तो जैसे सातवे आस्मां पे चढ़ा दिया पर वहाँ बैठे लोगों को देख कर लगा की मेरा ‘बांगला गान’ इनको कुछ खास समझ नहीं आया, पर सुरों का ज्ञान तो सबको होता है तो तारीफ़ें मिली। “ख़ैर अब इतना सोचना नहीं है, जो हुआ सो हुआ” सोचकर बैठ गयी मैं भी आखरी बचे खाली कुर्सियों में , दोस्तों के साथ।

सबने भाषण दिए- डिप्टी सि.एम साहब, प्रिंसिपल सर, और सारे अतिथिगन। सबकी कही हुई बातों ने उमंग भर दिया था, उन्होंने कहा हम स्वतंत्र है, देश बदला है, सब सुरक्षित है, इत्यादि , इत्यादि। तो हमारे कॉलेज के कल्चरल सेक्रेटरी के लम्बे से भाषण के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

दोस्तों के साथ सेल्फी ले कर कैद कर लिया हमने लम्हो को, फिर निकल गई मेन गेट पे।

कुछ दोस्तों के साथ घर की ओर निकल पड़ी, सबकी मंज़िल कि राह एक थी। बाज़ार तक पहुंचे ही थे कि हमेशा की तरह मनचलों ने आवारगी शुरू कर दी, कभी अजीब आवाज़ो से पुकारते तो कभी आगे पीछे बाइक घुमाते। “आज भी चैन नहीं इन शैतानो को!” सीमा बुदबुदायी। सीमा, अमन और मैं अक्सर इसी रास्ते से कॉलेज आना-जाना करते है।

हमेशा इनकी निगाहें ऐसी कि मानो जिस्म छिल जाएगा। हम तीनों तेज़ी से चल रहे थे और वो पीछे पीछे किसी गंदी सी मूवी का गाना बजाते हुए आ रहे थे। अब हम सब उस गली में थे जो हमारे मंज़िल का आखरी मोड़ था।

सीमा का घर सबसे पहले आता है तो हमने उसे अलविदा कह दिया, अमन के घर से मेरा घर कोई 50मिटर की दूरी पर होगा, चलते चलते उसका भी घर आ गया पर मैंने उससे विनती की कि वो मुझे घर तक छोड़ दे, मनचलो का यूँ पीछा करना वो हर किस्सा याद दिलाता है जो अखबार के कोनो में पढ़ा और न्यूज़ चैनल्स में देखा हो।

अमन मेरे घर पहुँचने तक साथ रहा, मन में बात खटकती रही कि मुझे सहारे की जरुरत क्यूँ पड़ी। चुकी ध्यान कहीं और था तो घर के बाहर खड़े कार पर गौर नहीं किया। चौखट के पास ढेरों जोड़ी चप्पल देख कर समझ आया कि घर पे लोग आये हुए हैं, सो अपने बिखरे बालों को हाथो से ही सवार का अन्दर गई। माँ एक बड़ी सी मुसकान के साथ मुझे दूसरे कमरे में ले गई।

“तैयार हो जाओ” कह कर माथा चूम लिया और चली गई, ‘वजह क्या होगी इस दुलार की’ सोचकर पर्दा थोड़ा सा हटाते ही देखा की कुछ लोग सोफे पे बैठे हैं । मेरी उम्र से कुछ 8-9 साल बड़ा वो लड़का होगा, उसकी झुकी नज़र, उसका पहनावा और टेबल पर रखे जितनी तरह के पकवान थे उससे मैंने अंदाज़ा लगा लिया कि चल क्या रहा है।

पापा ने कहा था कि ग्रेजुएशन के आखरी साल में ही वो मेरी सगाई करना चाहते हैं ताकि पढाई पूरी करते ही शादी हो पाए, पर आज अचानक! इसकी उम्मीद मुझे नहीं थी।

एक हलके नीले रंग का सूट पहनकर तैयार हो गाई। इशारो से माँ को बुला कर पूछा “अचानक क्यों आये सब लोग? मुझे आप ने पहले ये क्यों नहीं बताया?” माँ ने कहा की आज छुट्टी का दिन था तो उनलोगो ने सोचा की इस दिन का इस्तिमाल पूरी तरह से किया जाए और मेरे कॉलेज जाने के बाद उनका कॉल आया जिस वजह से माँ मुझे कुछ न बता सकी।

मैं माँ के साथ कमरे से निकली और सोफ़े के पास कि कुर्सी में बैठ गई; सब मुझे देख नहीं, घूर रहे थे, फिर उनके सवाल शुरू हुए- “पापा का नाम, तुम्हारा नाम, पता”। इन सवालों से मैं हीन महसूस करने लगी, “इंग्लीश होनोर्स के आखरी साल की छात्र को क्या ये मालुम न होगा, ऐसा क्यूँ सोचा उन्होंने, ऐसे सवाल क्यों? मेरी रूचि पुछ लेते, लक्ष्य पूछ लेते या फिर पूछते मेरी मर्ज़ी” दिमाग में बातें चल तो रही थी पर प्रतिक्रिया देने जितना साहस न था।

कुछ देर बाद मुझे कमरे में वापस भेज दिया गया। मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी सारी बातें सुन रही थी, उन्होंने दहेज़ की मांग की-12 लाख रूपए और कहा “आपकी बेटी थोड़ी सावली है भाईसहाब, बेटा तो हमारा सरकारी नौकरी करता है सो इतना तो पड़ ही जाएगा, आगे आप देख लो”। मैंने कभी अपने सावलेपन को कमज़ोरी नहीं समझा पर आज पापा का यूँ मौन रहकर बातें मान लेना मुझे कमज़ोर बना गया।

बैठ गयी ज़मीन पे ही और सोचने लगी उन भाषणों के बारे में जो आज सुन के आयी थी। “क्या यही है आज़ादी? मंचलो की मनमानी हो रही है, मुझे खुद को सुरक्षित महसूस करने के लिए किसी दूसरे का सहारा लेना पड़ रहा है, मुझसे मेरी मर्ज़ी तक नहीं पूछी जाती, मेरा ‘शादी’ शब्द की आड़ में सौदा हो रहा है, मेरे रंग से मुझे आँका जा रहा है… क्या आज़ादी बस खुल कर साँस लेना है, खुल कर जीना नहीं?

बन्द दरवाज़े के पीछे न जाने कितने ही सवाल आज ज़हन में आये और दबे, या मैंने दबाने कि कोशिश की।
पर अचानक “मुझे हक है आज़ादी का” चीख़ उठा मेरा मन और ये चीख़ काफ़ी बुलन्द थी दिमाग तक पहुँचने को।

खड़ी हुई, दुपट्टे से आंसू पोछे। पहले खुद को खुद से आज़ाद किया और फिर मैंने वो दरवाज़ा खोला, फिर कभी ना बंद होने को..

 

-अदिति चटर्जी

 

Aditi Chatterjee
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