Saloni | Mid Night Diary | Komal Pandey

सलोनी | कोमल पाण्डेय

आज बीते दिनों को याद करती हूँ तो सिर्फ एक ही चरित्र याद आता है वह थी – सलोनी। उसके साथ एक साल की वो याद जब जेब में कुछ ना होने पर भी सारे तारे अपने थे ये चाँद अपना था। महंगी से महंगी गाड़ियाँ मात्र खिलौना थीं।

सुबह से भूख से बैचेन उसने उस दिन दो एक चक्कर लगाये और अचानक सड़कों पर भटकते हुए सलोनी को फ्रूटी की एक बोतल मिली, मिलता तो रोज़ ही कुछ न कुछ है जो उस अकेली की भूख का समाधान करता है, लेकिन ये कुछ अलग था। उसके अल्हड पन ने उसे लात मरकर उडा देने को कहा तो पेट की मचलती भूख ने उठा लेने को और पी लेने को।

यही द्रव उसकी भूख से उठे उपद्रव को शांत कर सकती था या मार सकता था। सलोनी उस समय छोटी बच्ची थी, यही कोई दस साल की, जो अपने माँ बाप से बिछुड़ी हुई थी या माँ बाप ने खुद से दूर कर दिया था यह तो वही जानती है या उसके माँ बाप। सलोनी को बोलना आता था पर बोलती नहीं थी।

आसपास के साथ के फुटपथिये बच्चे उसे गूंगी समझते थे शुरुआत में, लेकिन धीरे धीरे साथ में खाने खेलने लगे थे। सब के सब भीख मांगते थे कचरे से खाना ढूंढते थे। सलोनी इन्ही बच्चो के साथ दिल्ली की सड़कों पर पिछले एक साल से भटक रही है, उसकी गोरी स्नेहिल काया अब स्याह हो चुकी है और उलझे हुए बालों में ना जाने कितने जन्मों के बदले का गर्द भरा पडा है।

वह लाचार है, बेबस है लेकिन कहीं न कहीं आत्मनिर्भर है। इसी निर्भरता के साथ वो एक साल से दिल्ली की सड़कों पर भटक रही है फुटपाथों पर सोयी है मगर न रोई है, न झिझकी है, और न ही डरी है। उसे लोगों के अच्छे बुरे स्वाभाव और स्पर्श में अंतर मालुम हो चुका है सिर्फ इस एक वर्ष में।

उसने फ्रूटी की बोतल को उठा लिया और अपनी बगल में दबाकर बैठ गयी उसी फ्लाईओवर के नीचे जो उसका आशियाना था आज उसने किसी साथी को नहीं पूछा फ्रूटी के लिए। और आज सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था और न ही किसी कचरे के ढेर पर कुछ ढूँढा ही था। लेकिन आज कुछ ऐसा होना था जो साल भर के अँधेरे को एक पल के अँधेरे में समेट लेना चाहता था और एक नए उजाले का जन्म होना था ।

आधी फ्रूटी ही पी पायी थी अपनी आँखों के सूखे आंसुओं को पोंछते हुए शायद ये आखिरी आंसू थे जो धीरे धीरे गीले हो रहे थे। उसके अन्दर की दुनिया और बाहर की दुनिया में एक फर्क बनने लगा। वही फर्क जो दिन को रात से अलग करता है और रात को दिन से। आँखे बंद हो चुकी थी, और एक गहरी नींद के आगोश में आ चुकी थी।

सूरज की पहली रौशनी के साथ एक अन्धकार ख़त्म हो चुका था, सलोनी का शरीर और फ्रूटी की बोतल फूटपाथ पर आज भी थे। कल रात जो फ्रूटी पी थी वह फ्रूटी एक्सपायर्ड थी, शायद वह भी सलोनी की तरह ही साल भर से फूटपाथ पर पड़ी थी बेसहारा, पर आत्म निर्भर। चारों तरफ वही छोटे बच्चे उसके जो साथी थे सूखे आंसुओं के साथ रो रहे थे। पर कुछ कर भी क्या सकते थे।

सरकारें हिल चुकी थी विपक्ष भी जाग गया था। एक साल का किस्सा एक दिन में सिमट चुका था। लेकिन इससे जो खुश थी वह थी सलोनी की आत्मा जो शरीर छोड़ चुकी थी। जो अब मुक्त थी, स्वछन्द थी, अब किसी भूख प्यास की मोहताज़ नहीं थी।

 

-कोमल पाण्डेय

 

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