Safed Rang | Ankit Singh Chandel | Mother's Day Special

सफेद रंग | अंकित सिंह चन्देल | मदर’स डे स्पेशल | #अनलॉकदइमोशन

आज मैंने अपने ऑफिस से जल्दी छुट्टी ले ली थी। हंसते मुस्कुराते हुए मैं मेरी कार के रेडियो पर बजरहे सन् नाइनटीस के गानों को खुद भी अपनी फटी आवाज में गुनगुनाते हुए मैं घर पहुंची। काफी खुश थी मैं आखिर क्यों ना होती अगले दिन जन्म दिन है मेरा, अपने जन्मदिन पर काफी बिजी हो जाती हूँ मैं। दोस्तों और रिश्तेदारों की कॉल व मैसेजेस के रिप्लाई देते-देते ही सारा दिन निकल जाता है।

ओह् अभी तक मैंने आप लोगों को अपना नाम नहीं बताया; हाय मैं रेहाना अपने शहर की सबसे मस्त लड़की जो जिंदगी को अपने नजरिए से देखती है और जीना भी जानती है ऐसा मैं नहीं सभी बोलते हैं।

खैर रात हो गई थी और मैं अपने बिस्तर पर लेटे हुए अपने मोबाइल में सेव कुछ पुरानी फोटोस देख ही रही थी के तभी मम्मी ने आवाज दी “रेहाना कल सफेद रंग की ड्रेस पहनना वह रंग तुम पर खूब जचता है।”

“जी मम्मी” मैंने मम्मी को जवाब दिया और शांत हो गई। यह कहकर उन्होंने मुझे किसी की याद दिला दी थी। हाँ यही तो कहा था उसने जब हम पहली मर्तबा मिले थे।

मुझे अच्छे से याद है। कॉलेज का पहला दिन था और मैं अपनी केमिस्ट्री क्लास के लिए लेट हो गई थी। मैं क्लास की ओर बढ़ ही रही थी कि तभी किसी ने पीछे से आवाज़ दी “जरा सुनिए! आप सफेद रंग पहना कीजिए वह रंग आप पर खूब जचेगा।” मैं पीछे मुड़कर उसे देखती इससे पहले ही वह भाग कर केमिस्ट्री क्लास में चला गया।

चूंकि कॉलेज का पहला दिन था तो प्रोफेसर आज सभी का नाम और पिछली क्लास में लाए हुए उनके नंबर पूछ रहे थे। कितना अजीब लगता है ना यूँ सभी के सामने यह बताना कि मैं फर्स्ट क्लास पास हुई हूँ या फिर सेकंड क्लास। मेरी पूछो तो यह परंपरा हटा ही देनी चाहिए आखिर हम सब एक जैसे हैं यार। खैर सभी ने अपना अपना परिचय दिया मैंने भी दिया अब क्या कर सकते हैं देना ही पड़ा।

अब उन जनाब की बारी थी जिन्होंने कुछ देर पहले ही अपने ओछे चरित्र का चरित्र प्रमाण पत्र मेरे हाथों में थमा दिया था। मगर यह क्या सभी की तरह वह अपना नहीं बल्कि हमारे प्रोफ़ेसर उसका परिचय दे रहे थे। उन्होंने अपनी मोटी आवाज में कहा- ” स्टूडेंट्स ये हैं आरुष।”
“आरुष नाम तो अच्छा है” मैंने खुद से ही कहा।

प्रोफ़ेसर ने आगे बताते हुए कहा कि “इन्होंने पिछली क्लास में अपने शहर में टॉप किया था। कुछ फैमिली प्रॉब्लम के चलते इन्होंने अपना ट्रांसफर हमारे कॉलेज में करवाया है और अब यह आपके साथ ही इसी क्लास में पढेंगे। इसी बीच वह मुझे देख कर मुस्करा दिया। कसम से पागलों वाली हरकतें हैं उसकी।
क्लास खत्म हुई और मैं बाहर निकली ही थी कि तभी पीछे से किसी जानी पहचानी आवाज ने मेरा नाम लिया और मुझे रुकने पर मजबूर कर दिया। “रेहाना……जरा सुनो!” यह तो वही आवाज थी जिसे मैंने लगभग 1 घंटे पहले केमिस्ट्री क्लास की सीढ़ियों पर यह कहते हुए सुना था कि “आप सफेद रंग पहना करो वह रंग आप पर खूब जचेगा।”

“हाय मेरा नाम आरुष है। मैं इस शहर में नया हूँ। मेरा कोई दोस्त भी नहीं है क्या तुम मेरी दोस्त बनोगी?” उसने मेरी तरफ हाथ बढाते हुए बडी सादगी से पूछा। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं मुडी और घर चली आई। घर पहुंचकर मैंने मम्मा के काम में उनका हाथ बटाया और फिर अपने कमरे में चली गई। आज पूरी रात मैं ठीक से सो नहीं सकी बार-बार उसी का चेहरा मेरी आंखो के सामने आ रहा था।

अगली सुबह जब मैं कॉलेज गई तो ऐसा लगा मानो जनाब कॉलेज के गेट पर खडे होकर मेरा ही इंतजार कर रहे थे, और जैसे ही मुझे देखा तो फटाक से बोल पडे- ‘रेहाना! क्या तुम मेरी दोस्त बनोगी…..?’ आखिरकार मैंने भी उस पर तरस हाँ खाकर बोल ही दिया। अब दोस्ती का हरा सिग्नल पाकर जनाब फिर से बोल पड़े- ‘तुम से बोला था ना कि सफेद रंग पहना करो वो रंग तुम पर खूब जचता है..’ यह सुनकर मैंने उसके चेहरे को देखा और मुस्कुरा दी।

हम रोज मिलने लगे। साथ साथ कॉलेज जाते तो कभी क्लास बंक करके वर्मा चाट भंडार से चाट खाने जाते। उसकी हरकतें बिल्कुल पागलों वाली थी मगर मुझे अच्छी लगती थी। उसकी हर बात मुझे अच्छी लगने लगी थी। शायद मुझे उससे इश्क होने लगा था। यही होता है ना जब किसी से आपको इश्क होता है तो उसकी पसंद नापसंद आप की पसंद नापसंद बन जाती है। उसकी दोस्ती में एक साल कब बीत गया पता ही नहीं चला। आखिरकार मैंने अपने दिल की बात उसे बताने का सोच लिया। यह जाने बगैर कि वह मेरे बारे में एक दोस्त के अलावा और क्या सोचता है।

अगली सुबह मैंने उसके पसंदीदा रंग की ड्रेस पहनी ‘सफेद रंग की।’ हाँ यह वही रंग था जिसे वह मुझे पिछले एक साल से पहनने के लिए बोल रहा था। मैंने खुद को आईने में देखा और मुस्कुरा दी। मैं पहली दफा किसी के लिए इतना सजी थी। उसके बाद मैंने अपने बेड पर रखे हुए उस कार्ड को उठाया जिसे मैंने अपने हाथों से रात भर बैठकर उसके लिए बनाया था और फिर चल दी उसे अपने दिल की बात बताने जिसके दिल की बात मैं खुद भी नहीं जानती थी।

आज आरुष काफी खुश नजर आ रहा था। वह मेरे पास आकर बोला- ‘अरे वाह! आज तो लगता है यह दिन मेरी जिंदगी का सबसे हसीन दिन है। तुमने आज सफेद रंग पहना है और पता है मुझे वह स्कॉलरशिप मिल गई है। जिसका मैं इतने दिनों से इंतजार कर रहा था और आज मुझे जाना है। यह कहकर उसने खुशी से मुझे गले से लगा लिया। मैंने काफी कोशिश की लेकिन फिर भी मेरे आंसुओं ने मेरी आंखों की दहलीज को पार कर ही दिया। मैंने अपने आंसुओं को पोंछते हुए और खुद को संभालते हुए कहा- ‘मुबारक हो…….’ मैं अभी भी उसके सीने से लगी हुई थी मेरा दिल उसे छोडने को तैयार ही ना था।

फिर उसने मुझसे कहा- ‘रेहाना……. रेहान………. मुझे जाना है’ और मुझे खुद से अलग कर वो जाने लगा। मैं उसे रोकना चाहती थी…, मैं उससे कहना चाहती थी कि मत जाओ प्लीज़ यहीं रुक जाओ ना…. यही मेरे पास…….. मैं तुमसे प्यार करती हूँ… नहीं जी सकती तुम्हारे बगैर….। मगर पागल ने मुझे कुछ बोलने ही नहीं दिया और मैं यूँ ही उसे अपनी आंखों से ओझल होता देखती रही। वो चला गया और और मैं अपने हाथों पर अपनी मोहब्बत का पहला खत वो ग्रीटिंग कार्ड लिये वही पर घण्टों तक बुत बनी खडी रही………

ट्रिंग….. ट्रिंग… ट्रिंग….. ट्रिंग… तभी मेरे मोबाइल की घंटी ने मुझे मेरी यादों से बाहर निकाला 12:00 बज चुके थे शायद किसी ने जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए कॉल किया था। मैंने नंबर देखा…. नंबर तो नया था मैंने फोन उठाया और कहा- ‘हेलो…..!’ उधर से आवाज ‘आई कल सफेद रंग पहनना वह तुम पर बहुत जचता है।’ यह वही खवाज थी जिसे मैंने 2 साल पहले कमेस्ट्री क्लास की सीढ़ियों पर सुनी थी। मैं मुस्कुरा दी………।

 

-अंकित सिंह चन्देल

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1 thought on “सफेद रंग | अंकित सिंह चन्देल | मदर’स डे स्पेशल | #अनलॉकदइमोशन

  1. एक उभरते हुए लेखक की उभरती हुई कहानी,,,,,
    मजा आ गया पढ़कर,,,,,

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