Roz Ki Bheed Bhaad | mid Night Diary | Pravin Pandey

रोज़ की भीड़ भाड़ | प्रवीण पाण्डेय

रोज़ की भीड़ भाड़ से कुछ अलग ही लग रही थी आज की भीड़ ट्रेन में…
पता नहीं क्यूँ लोगों के चेहरे आज अच्छे नहीं लग रहे थे,
और ना ही उनकी हँसी अच्छी लग रही थी।
दादर से ट्रेन पकड़ कर आधे घंटे के ऊपर हो गए थे,
मन मे अजीब कश्मकश थी और चिंता की लकीरे चेहेरे पर साफ दिखायी दे रही थी।
अनजाना सा स्टेशन देख कर नीरज पास में खड़े व्यक्ति से पूछ ही पड़ा “भाई साहब, कुर्ला स्टेशन कब आएगा? “
यह सुनते ही कुछ लोग हँसी उड़ाने लगे और कुछ उसे भला बुरा भी केहने लगे, ” ना जाने कैसे कैसे अनपढ़ लोग भी आज जाते हैं मुंबई में!! “
और वहीं कुछ लोग उसे बताने लगे के वो गलत रास्ते आ गया है।
नीरज की आंखे लाल थी और कपड़े भी बहुत मैले थे यह देख लोग उससे थोड़ी दूरी रखे हुए थे और कुछ लोग तो इशारों में एक दूसरे को बता रहे थे के वो बेवड़ा है कोई।

माँयूस चेहरे को एक और वजह मिल गयी माँयूसी को
बरकरार रखने की।

बात दो महीने पहले की है जब नीरज उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले के एक छोटे से गाँव मे रहा करता था।
तीन बहनों के बीच एक अकेला भाई होने के नाते घर की सारी ज़िम्मेदारी उसी के कंधे पर थी।
फालिज़ मार देने की वजह से पिताजी भी पूरा दिन बिस्तर पर ही बिताते थे।
माँ और उसकी बहनें पूरा दिन पढ़ाई और घर के काम-काज में ही रह जाते थे।
घर का खर्च संभालने के लिए नीरज ने सातवीं कक्षा तक ही पढ़ाई कर जीप में खलासी का काम करने लगा।
सुबह सुबह जल्दी उठकर काम पर जाता और दिन भर के थपेड़ों से थक हार कर देर रात घर वापस आता था।
बहुत ही उदासीन हो गयी थी ज़िन्दगी पर उसके पास वक़्त नहीं था के वो अपनी ख्वाहिशों को वक़्त दे पाए।

परिवार के बोझ से दबा चुप चाप काम में लगा रहता था।
जैसे-तैसे घर चल रहा था पर आमदनी उतनी ही थी और खर्चे बढ़ने वाले थे।
जैसे जैसे समय बीत रहा था बड़ी बहन अनिता की शादी की फिक्र सताने लगी उसे…
पिताजी की दवाएँ भी अब महँगी हो गयी थी,
यारों दोस्तों से भी राय मशविरा के अलावा उसे किसी भी तरह की आर्थिक सहायता नहीं थी।

एक रोज़ घर पर नीरज के बड़े मामा आए और उन्होंने यह सब देख थोड़ा अफसोस जताया और नीरज को थोड़ी दूर पास के एक पेड़ के पास लेकर गए और उसे सलाह देने लगे,
“देखो नीरज ;बचपन से ही तुम घर को संभालते आ रहे हो और तुम्हें भी ये बात अच्छे से पता है के जितने पैसे तुम कमाते हो उतने मे घर चलना अब दूभर है,
मेरी माँनो तो बम्बई चले जाओ, सुना है वहाँ जाकर लोगों की ज़िन्दगी बदल जाती है!!
रही बात घर के देखभाल की तो सरोज और अनिता दोनों ही बड़े हो गए हैं अब और वैसे भी मैं खुद हफ्ते दो हफ्ते में आकर घर का हाल-चाल ले लिया करूँगा।”
नीरज ने सिर हिलाते हुए कहा “ठीक है, मैं सोचता हूँ इस पर…”

उस दिन नीरज की पूरी रात कश्मकश में बीती और घंटों सोचने के बाद उसे भी समझ आने लगा के और कोई चारा भी नहीं है…

नीरज अगली सुबह टिकिट के लिए स्टेशन चला गया और बड़ी मुद्दतों के बाद जैसे तैसे २ रोज़ बाद की टिकिट खरीद लिया मुंबई के लिए…

घर पर आते ही उसने अम्मा को बताया के वो बम्बई जा रहा है और वहाँ से ही मनी आर्डर कर दिया करेगा पैसा…
अम्मा को बुरा भी लग रहा था और अच्छा भी!
बुरा इस बात का के इकलौता बेटा शहर जा रहा है बेगानो के बीच और अच्छा इस बात के लिए के अब पैसे की किल्लत ख़तम हो जाएगी!!

नीरज ने दो दिन बाद दोस्तों के साथ स्टेशन जा कर ट्रेन पकड़ ली और मुंबई के लिए रवाना हो गया।
सफर के लिए आलू की सब्ज़ी और पूरी लेकर निकला था वही खाते और करवटें बदलते नीरज मुंबई आ गया!!

यहाँ एक अलग सी हलचल थी ;एक अलग ही दुनिया सी लगी उसे,
लोग अपने में ही व्यस्त थे ;किसी को किसी से कोई लेना देना नहीं, मानो कोई किसी को देख ही नहीं पा रहा हो
उसे अच्छा नहीं लग रहा था लेकिन पापी पेट क्या ना करता?

बड़े मामा जी ने उसे अपने एक मित्र रामधारी चौरसिया जी का नंबर और पता दिया था ;जो बम्बई में पान की दुकान चलाते थे।
नीरज स्टेशन से सीधा वहीं गया और उनसे जा मिला।
रामधारी जी की दुकान बड़ी छोटी सी थी लेकिन ऊपर वाले के रहमो करम से अच्छा चलता था दुकान…

जब नीरज ने उन्हे नौकरी के लिए पूछा तो उन्होने कहा “मेरी दुकान में तो मुझे ज़रूरत नहीं है किसी को काम पर रखने की और ना ही मैं तुम्हें वेतन दे पाऊँगा क्यूँ ना तुम पेहरेदारी की नौकरी कर लो मेरी पहचान के एक आदमी हैं जिनको ज़रूरत है एक वाचमैन की रात के लिए।
दिन मे तुम मेरे घर पर खाना खा लिया करना और सोच समझ कर खुराकी दे देना मुझे.. “
उसने रामधारी जी के केहने पर पेहरेदारी की नौकरी कर ली!!

अभी कुछ ही दिन हुए थे मुंबई में उसे कि उसका किसी ने राह चलते बटुआ चुरा लिया
वो कहते हैं ना गरीबी में आटा गीला होना बस वही समझ लीजिए।
एक तो कम वेतन की नौकरी उसपर भी जो पैसे वो लाया था गाँव से वो भी नहीं रहे अब भला गुजर बसर हो तो कैसे हो?
रामधारी जी ने भी जवाब दे दिया “देखो भैया, तुम्हारे मामा मेरे घनिष्ट मित्र है इसलिए मैं तुम्हें रहने दे सकता हूँ एक महीने के लिए पर खाने की व्यवस्था आप कहीं और कर लो!!

मजबूरन उसे नौकरी छोड़नी पड़ी क्यूँकि मासिक वेतन नहीं उसे अब दिहाड़ी मजदूरी की ज़रूरत थी जिससे वो हर दिन के खाने और रहने का बंदोबस्त कर सके…
अब उसे घर की और घरवालों की बहुत याद आने लगी थी।
पर शायद जिम्मेदारियों के बोझ ने उसे इस क़दर दबा रखा था के वो चाहते हुए भी गाँव वापस नहीं जा सकता था!!

नौकरी छोड़े २ दिन बीत गए थे जेब में एक फूटी कौड़ी ना थी पर किस्मत थी जो दादर स्टेशन के पास किसी भले आदमी ने उसे १०० रुपये दे दिए थे और उसी में वो दिन गुज़ार रहा था।

मन मे कई सवाल थे ;जवाब भी थे उन सवालों के पर शायद मन नहीं हो पा रहा था उन जवाबों को मान लेने का!!

सरोज, अनिता और छोटी ना जाने कैसे होंगे? ;
पिताजी की दवाइयाँ कौन लाएगा?
अम्मा पता नहीं कैसी होंगी?
पता नहीं कितने अरमान लगाए होंगे वो भी मुझसे कि महीने भर बाद मैं पैसे भेजूंगा, उनकी हाल खबर लूँगा,
पर यहाँ तो मेरे ही पेट के लिए अन्न की किल्लत हुई पड़ी है।

अब स्टेशन के पास ही नीरज अपना बोरिया बिस्तर लगा कर बैठ चुका था और उम्मीद में था के कोई ना कोई हल ज़रूर निकल आएगा…

जैसे तैसे उसका अब खाने पीने का जुगाड़ हो जाता था और वो कहते हैं ना
“ये बम्बई है जनाब यहाँ तो आवारा सड़के भी ना जाने कितनो का घर होती हैं “
बस यूँ समझो के वही सड़कें अब नीरज का घर बन चुकी थीं…
दर-बदर भटकते भटकते नीरज को बुरी संगत लग गयी थी..
नीरज फुटपाथ पर बैठे गर्दुल्लों के साथ नशा करने लग चुका था …

अब नीरज को लत लग चुकी थी – लोगों से भीख मांगने की लत और शराब, बीड़ी और चरस की लत।
सुबह से शाम उसी सड़क पर आते जाते लोगों से भीख माँगना और उन पैसों को शराब में खर्च कर देना ये उसका रोज़ का काम हो चुका था…
शायद वो भुला देना चाहता था के उसका भी कोई परिवार है और उसके सर पर कोई ज़िम्मेदारी है!!

जैसे जैसे दिन पे दिन बीत रहे थे ;नीरज की हालत और भी खराब होती जा रही थी। नीरज आर्थिक मानसिक और शारीरिक हर तरह से कमज़ोर हो चुका था।  जैसे तैसे 2महीने बीते पर अब उसे ये समझ आ चुका था के बम्बई उसके लिए नहीं है शायद और अब उसे घर चले जाना चाहिए। उसे तो इतना भी पता ना था के उसका परिवार ज़िन्दा भी है या नहीं पर उसे इतना ज़रूर पता था के अगर अपनी ज़िन्दगी प्यारी है तो अब उसे घर लौट जाना चाहिए!!

कश्मकश का सिलसिला ख़तम हुआ और नीरज ने दादर से ट्रेन पकड़ लिया कुर्ला के लिए पर उसे शायद पता नहीं था के कुर्ला के लिए कौनसी ट्रेन जाती है और ग़लती से उसने बोरीवली की तरफ जाने वाली ट्रेन पकड़ लिया..

रोज़ की भीड़ भाड़ से कुछ अलग ही लग रही थी आज की भीड़ ट्रेन में
पता नहीं क्यूँ लोगों के चेहरे आज अच्छे नहीं लग रहे थे
और ना ही उनकी हँसी अच्छी लग रही थी,
दादर से ट्रेन पकड़ कर आधे घंटे के ऊपर हो गए थे।

मन मे अजीब कश्मकश थी और चिंता की लकीरे चेहेरे पर दिखायी दे रही थी ..
अनजाना सा स्टेशन देख कर नीरज पास में खड़े व्यक्ति से पूछ ही पड़ा “भाई साहब, कुर्ला स्टेशन कब आएगा? “
यह सुनते ही कुछ लोग हँसी उड़ाने लगे और कुछ उसे भला बुरा केहने लगे के, “ना जाने कैसे कैसे अनपढ़ लोग भी आज जाते हैं मुंबई में?” और वहीं कुछ लोग उसे बताने लगे के वो गलत रास्ते आ गया है…

नीरज की आंखे लाल थी और कपड़े भी बोहोत मैले थे यह देख लोग उससे थोड़ी दूरी रखे हुए थे और कुछ लोग तो इशारों में एक दूसरे को बता रहे थे के वो बेवड़ा है कोई..

माँयूस चेहरे को एक और वजह मिल गयी माँयूसी को बरकरार रखने की!!

ज़िन्दगी से हताश और और हालातों से मजबूर नीरज तिलमिला कर मालाड स्टेशन पर ही उतर गया और वहाँ से उसने कुर्ला के लिए ट्रेन तो पकड़ ली पर कुर्ला पहुँचने में देर हो चुकी थी और नीरज की ट्रेन छूट गयी….

और एक बार फिर बुरी संगत और बुरी लतों ने नीरज को कुछ इस तरह धर दबोचा के इसबार उनसे वो उबर ना पाया!!!

नीरज इंजेक्शन का उपयोग कर नशे कर रहा था पर उसे थोड़े ही पता था के दुसरो के साथ इस्तेमाल की हुई उन इंजेक्शनों से उसे एड्स हो जाएगा।
नीरज अब ठीक से चल भी नहीं सकता था, शरीर पर लाल चकत्ते निकल रहे थे दिनों-दिन वह पतला होता जा रहा था।

एक महीने के ऊपर हो चुका था नीरज को बम्बई आए,
अम्मा और अनिता दोनों ही चिंतित थे के आखिर ऐसा भी क्या काम के घर वालों से एक महीने में एक बार भी बात नहीं की नीरज ने। और तो और मनी ऑर्डर भी नहीं आया अभी तक।

अब अनिता से रहा ना गया उसने मामा से कहा के वो बात करें अपने बम्बई वाले रामधारी जी से और ज़रा हाल खबर ले कर बताएँ। मामा जी ने जब फोन लगाया तब जाकर पता चला के नीरज तो कब का छोड़ दिया वो घर और वो नौकरी।

अब तो अनिता और व्याकुल हो गयी और उसने फौरन टिकिट निकाल बम्बई के लिए रवाना हो गयी!!

बम्बई आकर सीधे अनिता पुलिस स्टेशन में जाकर रपट दर्ज करायी नीरज के ना मिलने की।

रहने के लिए कोई पहचान वाला था नहीं के अनिता रह सके किसीके पास, इसलिए उसने एक सस्ते से होटल में किराए पर रुक गयी यह सोचकर के हाल खबर मिलते ही वह वापस गाँव चली जाएगी।

दो दिन बाद पुलिस ने अनिता को बुलाया और उसे बताया के नीरज नशे करता था और भीख माँगता था और नशे के ही चक्कर में वह बीमारियों में उलझता गया और उसकी मृत्यु हो गयी।

यह सब बिल्कुल ही अजीब सा था सुनने के लिए अनिता को क्यूँकि नीरज ऐसा बिल्कुल ना था!!

अनिता तिलमिला उठी ये सब सुन कर.. एक साथ इतनी सारी बुरी खबर सुन पाना उससे बर्दाश्त ना हुआ!!

फौरन अनिता होटल जाकर अपने कपड़े और सब सामान बाँधने लगी… यह सब करते समय भी मन में बस यही सवाल चल रहा था के घर जाकर किस मुह से बताऊँ अम्मा बाबा को!! क्या वो ये सुन पायेंगे के वो इकलौता बेटा जो हमेशा से ही घर की ज़िम्मेदारी उठाता आया आज वो नशे करने के लिए भीख माँगते माँगते मर गया वो भी पराये शहर में जाकर!!

तभी कमरे के दरवाजे पर किसी ने दस्तक लगायी.. अनिता ने जाकर दरवाज़ा खोला तो देखा के एक अधेड़ उम्र की औरत होटल मालिक के साथ खड़ी थी!!
उसने अंदर की तरफ कदम बढ़ाते हुए अनिता से पूछा “बम्बई में नयी लगती हो, कुछ काम की तलाश में हो क्या?”
अब अनिता यह सोचने लगी के भैया तो अब रहे नहीं तो क्यूँ ना मैं ही काम कर यहाँ से घरवालों को पैसे भेजूं!!
घर की हालत ठीक हो जाए तो घरपर भी बता दूँगी भैया के बारे में!!
उस औरत ने फिर पूछा “क्या सोच रही हो? “
” जी हाँ ;काम के तलाश में आई थी मैं पर अभी तक कुछ मिला नहीं “अनिता ने झुके सिर में कहा।

इसपर वह औरत पूछ पड़ी” मेरे साथ इस होटल में काम करोगी? मैं जानती हूँ कि तुम पूछोगी कैसा काम? देखो काम बस इतना सा है के यहाँ आने वाले मेहमानों को किसी चीज़ की शिकायत ना होने पाए बस!! “
अनिता को यह काम किसी भी तरह से जटिल नहीं लगा इसलिए उसने हामी भर दी!!

अनिता को अगली शाम वहाँ का सच पता चला के उसके जैसी और भी कई सारी लड़कियाँ उस होटल में फँस गयी हैं और वो कोई आम होटल नहीं है वह एक ऐसा होटल है जो शाम होते कोठे में तब्दील हो जाता है!!

वहाँ से लड़किया जा भी नहीं पाती क्यूँकि जब पहली बार कोई पुरुष आकर उनके साथ दुष्कर्म करता हैं तब उनकी तस्वीरें खीच ली जाती है और उन्हे धमकाया जाता है के वो तस्वीरें जगह जगह पर फैला दी जाएंगी!!

अब अनिता फँस चुकी थी इस जाल में ;लाख सोचने के बाद उसने अपनी ज़िन्दगी को कुर्बानी देकर घरवालों को खुश रखना मुनासिब समझा और इस काम में लगे रहने का निश्चय किया!!

अब अनिता दर महीने 10हज़ार रुपए मनी ऑर्डर कर दिया करती है साथ में अम्मा बाबा और अपनी बहनों से भी बात कर लिया करती है!!

नीरज के बारे में जब वो पूछते हैं तो कह देती है “नीरज भैया का काम ऐसा है के उन्हे ज़रा सी भी फुर्सत नहीं मिलती मैं भी उन्ही के कामों में हाथ बँटा लेती हूँ!!”
यह सब झूठ बोलते वक़्त उसकी आँखो से आँसू छलक ही जातें हैं पर क्या करे ;कहे भी तो क्या?

बाबा की दवाई और बहन की पढ़ाई के लिए अब पैसे कभी कम नहीं पड़ते ;कमी है तो सिर्फ उस मेहनती बेटे और उस शादी की उम्र वाली बेटी की थी जिनके अरमानों की दिन दहाड़े हत्या हो गयी इस अनजान शहर में!!
अनिता कभी अपनी किस्मत तो कभी ज़िन्दगी को कोसती है और सोचती है क्या कसूर था उसका जो ऐसी सज़ा मिली??

 

-प्रवीण पाण्डेय 

 

Pravin Pandey
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