Rivaayat | Mid Night Diary | Abhinav Saxena

रिवायत | अभिनव सक्सेना

मिरी खुद से अदावत हो रही है
मुझे ये किसकी आदत हो रही है।

हमीं से खुद नहीं मिल पा रहे हम
किसी को तो शिकायत हो रही है।

घने पेड़ों के साये हैं बहुत से
तभी चलने में दिक्कत हो रही है।

लहू के दाग भी धोये हैं इतने
कि इस रंग तक से रग़बत हो रही है।

मोहब्बत हमसे करने की दुबारा
न जाने किसकी हिम्मत हो रही है।

सदायें इश्क की घोल कर फ़िज़ा में
हवाओं से शरारत हो रही है।

दबी आवाज में करने को बातें
किसी की तो ज़रूरत हो रही है।

खुदा को भूल जाने की आजकल
नई कोई रिवायत हो रही है।

 

-अभिनव सक्सेना

 

Abhinav Saxena
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