रिहा हो जाएं | अनुभव कुश | #अनलॉकदइमोशन

इस दफा तुझपे मुश्किल बस इतनी आए,
एक ईद का चांद हो और धुंध समां हो जाए।

तुम ग़ज़ल रचो मुझसे तामीर हो कविता,
जब तुक मिला बैठे तो खुदा रज़ा हो जाए।

उतार तो लो कागज़ में सारे ख़्वाब आंखों से,
जला दो इन्हे के ये खुशनुमां फिज़ा हो जाए।

मिलते तो बहुत हैं मेहबूब पर मर मिटने वाले,
एक जुनून हो के हम वतन पे फ़िदा हो जाएं।

मेरी अधूरी ग़ज़ल तेरे सुर्ख लबों की प्यासी है,
वो लफ्ज़ आखिरी दो और हम जुदा हो जाएं।

ज़िन्दगी में ‘कुश’ अनुभव तो बहुत हुआ है,
गर तजरबा कह दे तो क्यों ना रिहा हो जाएं।

 

अनुभव कुश

 

Anubhav Kush
Anubhav Kush

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