Red Light Wali Ladki Se ISHQ | Inspired From True Events | Mid Night Diary | Suraj Maurya

रेड लाइट वाली लड़की से इश्क़ | सूरज मौर्या | इंस्पायर्ड फ्रॉम ट्रू इवेंट्स

भोलेनगर में जन्मी अनुराधा की दास्तान दुखद और फिल्मी सी है. अनुराधा बेइंतहा खूबसूरत थी, पर उस की बदकिस्मती यह थी कि जब वह 15 साल की हुई तो मांबाप का साया सिर से उठ गया. लेकिन वह लावारिस कहलाने से इसलिए बच गई, क्योंकि उस के पिता ने 2 शादियां की थीं. जब सगे मांबाप की मौत हो गई तो सौतेली मां ने उसे सहारा दिया.

सौतेली मां के पास भी स्थाई आमदनी का कोई जरिया नहीं था, इसलिए वह अनुराधा को साथ ले कर भोलेनगर में ही रहने वाले अपने भाई राजा उर्फ बिजली के घर ले गई. इस तरह अनुराधा को छत तो मिल गई, पर प्यार नहीं मिला. सौतेले मामा राजा के घर की भी माली हालत ठीक नहीं थी. जैसेतैसे खींचतान कर तीनों का गुजारा होता था. कई बार तो फांकों की भी नौबत आ जाती थी.

15 साल की अनुराधा पर यौवन कुछ इस तरह मेहरबान हो गया था कि जो भी उसे देखता, बस देखता ही रह जाता. भोलेनगर में उस की जितनी खूबसूरत लड़कियां कम ही होती हैं. वह लोगों की चुभती निगाहों से नावाकिफ नहीं थी. हालांकि अनुराधा कहने भर को पढ़ी लिखी थी, पर समझ उस में जमाने भर की आ गई थी.

सौतेले मामा के घर का माहौल अनुराधा को रास नहीं आ रहा था, इसलिए अकसर उसे अपने मां बाप की याद आती रहती थी, जिन्होंने उसे ले कर ढेरों सपने संजोए थे. खुशी क्या होती है, यह अनुराधा सौतेले मामा के घर आ कर भूल सी चुकी थी. जहां अभाव था, रोज की जरूरतों को ले कर मारामारी थी और उन्हें पूरा करने के लिए ढेर सारे समझौते करने पड़ते थे. एकलौती अच्छी बात यह थी कि सौतेली मां और मामा उस पर अत्याचार नहीं करते थे.

कुछ दिनों की तंगहाली के बाद अनुराधा ने महसूस किया कि अब घर में पैसा आने लगा है. इस का मतलब यह नहीं था कि पैसा बरसने लगा था, बल्कि यह था कि अभाव कम हो चले थे और जरूरतें पूरी होने लगी थीं. अब किसी चीज के लिए तरसना नहीं पड़ता था.

पैसा कहां से और कैसे आ रहा है, यह पता करने के लिए अनुराधा को कहीं दूर नहीं जाना पड़ा. गांव और आसपास के कुछ रसूखदार पैसे वाले लोगों का उस के घर आनाजाना शुरू हो गया था.

उन लोगों के आते ही सौतेली मां उन के साथ एक कमरे में बंद हो जाती और 4-6 घंटे बाद जब उन के जाने पर बाहर निकलती तो उस का जिस्म भले ही निढाल होता, पर चेहरे पर रौनक होती थी. यह रौनक उन पैसों की देन थी, जो उसे शरीर बेच कर मिलते थे. अनुराधा अब पहले सी नासमझ और मासूम नहीं रह गई थी. वह इस सब का मतलब समझने लगी थी.

अब कभीकभी बड़ीबड़ी कारें भी सौतेली मां को लेने आती थीं. 3-4 दिन बाहर रह कर वह लौटती तो उस के पास नोटों की गड्डियां होती थीं. इस पर अनुराधा को गुस्सा और तरस दोनों आता था कि क्या जरूरत है देह बेचने की, तीनों मिल कर मेहनतमजदूरी कर के इतना कमा सकते हैं कि इज्जत से गुजारा कर सकें. उसे इस माहौल में घुटन सी होने लगी थी. अब वह कोठेनुमा इस घर से आजाद होने की सोचने लगी थी. पर यह आसान काम नहीं था. भोलेनगर के बाहर की दुनिया इस से जुदा नहीं होगी, यह भी अनुराधा की समझ में आने लगा था. कहीं भाग जाना या चले जाना उस के वश की बात नहीं थी.

आनेजाने वाले ग्राहकों की नजरें अनुराधा के खिलते यौवन पर पड़ने लगी थीं. इस से वह और घबरा जाती थी कि कहीं ऐसा न हो कि उसे भी देहधंधे की दलदल में धकेल दिया जाए. हालांकि अभी तक मां या मामा की तरफ से इस तरह की कोई बात नहीं की गई थी, पर उस का डर अपनी जगह स्वाभाविक था क्योंकि अकसर मामा खुद मां के लिए ग्राहक ढूंढ कर लाता था.

कोई 3 साल पहले एक दिन राजा ने बताया कि अब उसे मेरठ के रेशमबजार में रहने वाले मौसा के यहां जाना है, जो उसे वहां कोई अच्छा काम दिला देंगे. मुद्दत से आजादी के लिए छटपटा रही अनुराधा ने जब यह खबर सुनी तो खुशी से झूम उठी कि चलो अब जिंदगी रास्ते पर आ जाएगी. वह मेरठ में मेहनत कर के कमाएगी, इसलिए वह झट से राजी हो गई. जल्द ही मामा ने उसे मौसा के पास मेरठ पहुंचा दिया.

मेरठ में 4 दिन भी चैन से नहीं गुजरे थे कि मौसा, जिस का नाम मनोज सिंह उर्फ बाबा था, ने अपना असली रूप दिखा दिया. अपनी बेटी समान अनुराधा से यह कहते उसे कतई शरम नहीं आई कि अब उसे यहां रह कर धंधा करना होगा.

अब अनुराधा को समझ में आया कि क्यों कुछ दिनों से मामा उस से नरमी से पेश आ रहा था. लेकिन जब धंधा ही करवाना था तो उसे यहां ला कर क्यों छोड़ा गया. यह काम तो वह गांव में भी करवा सकता था. यह बात अनुराधा की समझ में तुरंत नहीं आई. चूंकि वह इस पेशे में नहीं आना चाहती थी, इसलिए वह मनोज सिंह के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाई कि उस से यह पाप न करवाया जाए.

उस के गिड़गिड़ाने का मनोज सिंह पर कोई असर नहीं हुआ, उलटे उस ने अनुराधा को बताया कि उस का मामा उसे 9 लाख रुपए में बेच गया है. यह सुन कर अनुराधा के होश फाख्ता हो गए. अब उस की समझ में आ गया कि सौतेली मां और मामा ने किस्तों में पैसा कमाने के बजाय एकमुश्त मोटी रकम कमा ली है. अपनी किस्मत पर वह खूब रोई.

भागने या बचने का कोई रास्ता उसे दिखाई नहीं दिया, इसलिए वह मनोज सिंह के इशारों पर नाचने लगी. रोज ग्राहक आते थे, जिन से मनोज सिंह अच्छे पैसे वसूल कर के उसे उन के साथ कमरे में बंद कर देता था. ग्राहक उसे तबीयत से नोचतेखसोटते थे और पूरी कीमत वसूल कर चलते बनते थे. धीरेधीरे अनुराधा को पता चला कि उस इलाके के ज्यादातर मकानों में यही काम होता है.

अनुराधा को अहसास हो गया कि उस की जिंदगी की यही नियति है. गांव में रहते वह सपने देखा करती थी कि उस की शादी हो गई है और उस का एक अच्छाखासा देवता समान पति है, जिस के लिए वह सुबहशाम खाना बनाती है, उस के कपड़े प्रैस करती है और उस का खूब ध्यान रखती है. वह भी उसे खूब प्यार करता है.

लेकिन यहां रोज एक नए मर्द से उस की शादी होती थी, जो प्यार के नाम पर 2-4 घंटे में अपनी जिस्मानी प्यास बुझा कर चलता बनता था. कभीकभी अनुराधा को अपने जिस्म से घिन आती थी. शरीर ही नहीं, बल्कि उसे तो अपनी आत्मा से भी घिन आने लगी थी, पर वह कुछ कर नहीं सकती थी.

मनोज सिंह के लिए वह टकसाल या नोट छापने की मशीन थी, जो रोज हजारों रुपए उगलती थी. एवज में उसे अच्छा खानापानी, कपड़े और कौस्मेटिक का सामान मिलता था. वह एक ऐसी कठपुतली थी, जिस की डोर रिश्ते के इस मौसा पान सिंह की अंगुलियों में बंधी थी.

मेरठ में रहते हुए अनुराधा ने हजारों ग्राहकों को निपटाया. कुछ ही महीनों में वह एक माहिर कालगर्ल या वेश्या बन गई. उस के भीतर की भोलीभाली अल्हड़ लड़की वक्त से पहले ही एक तजुर्बेकार औरत में तब्दील हो गई. वह खुद इस बदलाव को महसूस कर रही थी, पर दिल की बात साझा करने के लिए कोई साथी नहीं था. एक ऐसे मर्द की चाहत उसे हमेशा रहती थी, जो ग्राहक न हो, शरीर से परे उसे एक औरत समझे. पर इस धंधे में आमतौर पर ऐसा नहीं होता इसलिए वह ऐसी बातें सोचने से भी घबराने लगी थी.

लेकिन अनुराधा की यह गलतफहमी गलत साबित हुई कि 16-17 साल की उम्र में ही उस ने दुनिया देख ली है. एक दिन मनोज सिंह ने उसे भोपाल की मशहूर तवायफों दुर्गा के हाथों 15 लाख रुपए में बेच दिया. यह सौदा कब और कैसे हो गया, अनुराधा को इस की हवा भी नहीं लगी. देहव्यापार के जिस धंधे की महज साल भर में ही वह खुद को प्रोफेसर समझने लगी थी, वह उस की नर्सरी क्लास था.

चूंकि अनुराधा जवान थी और शरीर अभी तक कसा हुआ था, इसलिए दुर्गा ने ठोकबजा कर मनोज सिंह को 15 लाख रुपए दे दिए. मनोज सिंह ने उसे बेच कर 6 लाख रुपए का मुनाफा तो कमाया ही, इस से भी ज्यादा उस ने साल भर में उस से ग्राहकों के जरिए कमा लिए थे.

इस तरह अनुराधा भोपाल चली गई. मेरठ से भोपाल के रास्ते भर में उस की समझ में आ गया था कि एक तवायफ की जिंदगी में न कोई अहसास होता है न जज्बात. वह दलालों की जायदाद होती है, इस से आगे या ज्यादा कुछ नहीं.

दुर्गा वहां की जानीमानी तवायफ थी. उस की जानपहचान देश भर की देहमंडियों के कारोबारियों और दलालों से थी. इस गली में दाखिल होते ही अनुराधाको अहसास हो गया कि उमराव जान जैसी फिल्मों में कुछ गलत नहीं दिखाया गया था. जो कुछ बदलाव आए हैं, वे लोगों को दिखते नहीं या लोग जानबूझ कर उन से वास्ता नहीं रखते. ये एक ही सिक्के के 2 पहलू हैं.

भोपाल आ कर अनुराधा को लगा कि इस से बेहतर तो मेरठ ही था, क्योंकि दुर्गा की सरपरस्ती में उसे कई बार लगातार 20 ग्राहकों को निपटाना पड़ता था. दुर्गा जल्द से जल्द मनोज सिंह को दिए 15 लाख रुपए उस की चमड़ी से वसूल लेना चाहती थी. यहां की कालगर्ल्स के बीच भद्दे हंसीमजाक होते थे, जिन से शुरू में तो अनुराधा परहेज करती रही, लेकिन बाद में उसे लगा कि एकाकीपन से बचने के लिए इसी माहौल का हिस्सा बन जाना बेहतर है.

दुर्गा की उम्र और जिस्म दोनों ढलान पर थे, फिर भी वह जितना हो सकता था, अपना शरीर बेचती थी. पर बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए वह अब लड़कियों की खरीदफरोख्त भी करने लगी थी. एक तरह से उस का रोल कोठों की मौसियों सरीखा था, जो लड़कियों से जरूरत के मुताबिक नरमी और सख्ती दोनों से पेश आना जानती हैं.

दुर्गा के यहां सुबह से ही ग्राहक आने लगते थे. यहां देश के हर इलाके के लोग आते थे, जिन में से कुछ शौकिया तो कुछ आदी थे. इन लोगों और दलालों की भाषा में अनुराधा नया माल थी, इसलिए उस की पूछपरख और कीमत ज्यादा थी. वह एक मशीन की तरह उठती थी और बुत की तरह जब वक्त मिलता, सो जाती थी.

अनुराधा की समझ में अच्छी तरह आ गया था कि उस की हालत जहाज के उस पंछी जैसी है, जो बीच समुद्र में है. जहाज से उड़ कर पंछी कितनी भी दूर चला जाए, कोई ठौरठिकाना न मिलने पर उसे झख मार कर जहाज पर ही वापस आना है.

अब सब कुछ उस के सामने खुली किताब की तरह था. जिस दिन दुर्गा अपने 15 के 50 लाख बना लेगी, उस दिन उसे 10-20लाख रुपए में किसी और के हाथ बेच देगी. यह किस्मत की बात होगी कि तब वह कहां जाएगी, हैदराबाद, मुंबई, पुणे या फिर कोलकाता. जल्दी ही वह नर्मदा गली की ऐसी रौनक बन गई थी, जिस की खुद की जिंदगी स्याह थी.

भागने का खयाल भी इन बदनाम गलियों में किसी गुनाह से कम नहीं होता. इसलिए अनुराधा आजादी के सपने नहीं देखती थी. पर उस का एक राजकुमार वाला सपना अभी भी टूटा नहीं था. शायद कालगर्ल्स की जिंदगी का सहारा यही सपना होता है, मकसद भी, जिस के बारे में वही बेहतर जानती हैं.

ऐसी फिल्मी और किताबी बातें सोचतेसोचते वे बूढ़ी हो जाती हैं और फिर खुद की जैसी दूसरी मजबूर और वक्त की मारी लड़कियों को इस दलदल में धकेल कर धंधा करवाने लगती हैं, जिस से बुढ़ापा चैनसुकून और आराम से कट सके. उन के इस लालच या स्वार्थ से कितनी लड़कियों का सुकून और चैन छिन जाता है, वे उस से कोई वास्ता नहीं रखतीं.

भोपाल आने के बाद अनुराधा ने साफ महसूस किया था कि उस पर कई मर्दानी नजरों का सख्त पहरा रहता है. वे नजरें सीसीटीवी कैमरों की तरह हैं, जो खुद मुश्किल से दिखते हैं, पर उन की नजर दूर तक रहती है. वहां से भागने की कोशिश करने वाली लड़कियों का कितना बुरा हश्र हुआ, इस के किस्से इतने डरावने तरीके से सुनाए जाते थे कि कोई लड़की ऐसा सोच भी रही हो तो वह खयाल दिलोदिमाग से निकालने में ही अपनी भलाई समझे.

कुछ ही दिनों में अनुराधा ने दुर्गा का इतना भरोसा जीत लिया था. अब उस की निगरानी पहले जैसी नहीं होती थी. उसे नियमित और भरोसेबंद ग्राहकों के साथ अकेला छोड़ा जाने लगा था. लेकिन ग्राहक के साथ कहीं बाहर जाने की इजाजत अभी भी उसे नहीं थी.

एक दिन विनोद शुक्ला नाम का ग्राहक उस के पास आया तो अनुराधा को वह वही शख्स लगा, जिस के सपने वह मेरठ आने के पहले से देख रही थी. विनोद में कई बातें ऐसी थीं, जो विनोद को भा गई थीं. वह आम ग्राहकों की तरह उस पर टूट नहीं पड़ा था. उस ने कोई जल्दबाजी भी नहीं दिखाई थी. पहली बार में ही दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई, जिस से अनुराधा को लगा कि विनोद का औरतों को देखने का नजरिया दूसरों से अलग है. उस दिन पहली बार विनोद का दिन किसी 22 साल की लड़की की तरह धड़का तो वह सिर से ले कर पांव तक सिहर उठी. उस की समझ में नहीं आया कि यह क्या हो रहा है.

विनोद जाने लगा तो अनुराधा मायूस हो उठी. वह अपने मजबूर दिल को संभाल नहीं पाई. उस ने विपिन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘फिर आना.’’

पेशे से ड्राइवर विनोद एक प्रतिष्ठित परिवार का बेटा था. नीलकंठ से भोपाल तक का कोई 2 घंटे का रास्ता है, जिसे अब विनोद अनुराधा के लिए नापने लगा था. वह अकसर अनुराधा के पास जाने लगा तो अनुराधा ने उसे अपनी जिंदगी की कहानी विस्तार से सुना दी, जो भोलेनगर से मेरठ होते हुए नागपुर के बदनाम इलाके नर्मदा गली के उस कोठे पर आ कर खत्म होती थी.

प्यार अकेली अनुराधा को ही नहीं हुआ था, बल्कि विनोद भी उस से प्यार करने लगा था. यह प्यार ठीक वैसा ही था, जो सन 1991 में प्रदर्शित महेश भट्ट की देहव्यापार पर बनी फिल्म ‘सड़क’ में दिखाया गया था. इस फिल्म में नायक संजय दत्त टैक्सी ड्राइवर होता है और मजबूरी की मारी एक कालगर्ल पूजा भट्ट से प्यार कर बैठता है. इस फिल्म में महारानी वाली भूमिका सदाशिव अमरापुरकर ने निभाई थी,जो खूब चर्चित रही थी.

यहां तो कदमकदम पर महारानियां थीं, लेकिन प्यार भी कहां आसानी से हार मानता है. अनुराधा और विनोद ने तय कर लिया था कि भाग कर शादी कर लेंगे और कहीं भी बस जाएंगे. अच्छी बात यह थी कि विनोद हिम्मत वाला युवक था, जो दूसरों की तरह बदनाम गलियों और इलाकों के गुंडों और दलालों से नहीं डरता था.

विनोद के प्यार में डूबी अनुराधा भूल गई थी कि तवायफ को प्यार करने की इजाजत न बाजार देता है और न समाज. फिर किसी से शादी कर के गृहस्थी बसाना तो कालगर्ल्स के लिए ख्वाब जैसी बात होती है.

विनोद जानती थी कि रसूख वाली दुर्गा के हाथ बहुत लंबे हैं और उस के संबंध कुछ रसूखदार लोगों से भी हैं. गुंडे और दलाल पालना तो कोठों की परंपरा है, जिन का काम यही होता है कि कोई लड़की कोठों की परंपरा को तोड़ कर भागने की कोशिश न करे और करे तो उस का इतना बुरा हाल करो कि वह दूसरी लड़कियों के लिए सबक बन कर रह जाए.

भोपाल में सालों से कोठा चला रही दुर्गा सिर्फ एक बार ही पीटा एक्ट के तहत गिरफ्तार हुई थी. इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह इस कारोबार की कितनी सधी हुई खिलाड़ी थी. कई पुलिस वालों से उस के दोस्ताना संबंध थे.

एक दिन दुर्गा का सारा सयानापन और तजुरबा धरा रह गया, जब उस के पिंजरे से अनुराधा नाम की एक मैना अपने तोते विनोद के साथ भाग निकली. वह 9 जनवरी की दोपहर थी, जब हमेशा की तरह विनोद ग्राहक बन कर आया. वह समय दुर्गा के नहाने का होता था, इसलिए वह विनोद और अनुराधा को कमरे में छोड़ कर नहाने चली गई.

दरअसल, भागने की योजना अनुराधा और विनोद पहले ही बना चुके थे. अनुराधा ने विनोद को बताया था कि गहमागहमी और दलालोंगुंडों की मौजूदगी के चलते रात में भागना कतई मुमकिन नहीं है, इसलिए दिन का समय इस के लिए ठीक रहेगा. उस समय बाजार के ज्यादातर लोग और लड़कियां सोई रहती हैं.

अनुराधा भागी तो दुर्गा तिलमिला उठी. न केवल दुर्गा, बल्कि देहव्यापार से जुड़े तमाम लोग हैरान रह गए. चंद घंटों में ही अनुराधा के भागने की खबर आग की तरह देहव्यापार के राष्ट्रीय बाजार में फैल गई. फिर तो परवीन के गुर्गों ने उसे शिकारी कुत्तों की तरह ढूंढना शुरू कर दिया.

2 दिलों में प्यार का जज्बा एक बार पैदा हो जाए तो उसे रोका नहीं जा सकता. यही अनुराधा और विनोद के साथ हुआ था. दोनों ज्यादा दूर नहीं भागे. मुद्दत बाद अनुराधा को नरक से छुटकारा मिला था. वह तो हार मार चुकी थी, लेकिन विनोद की मर्दानगी और मोहब्बत ने उसे नई जिंदगी दी, इसलिए वह उसे दिल ही दिल में देवता का दरजा दे चुकी थी. किसी तवायफ को जीवनसंगिनी बनाने का फैसला भी कोई आम आदमी नहीं कर सकता.

निश्चित रूप से विनोद सच्चा मर्द है और शाबाशी का हकदार भी, जिस ने अनुराधा को गृहिणी बना कर जीने का सपना पूरा किया।

 

-सूरज मौर्य

 

Suraj Maurya
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