रक्त- ए-सफ़र | अश्वनी सिंह

मेरे रख्त-ए-सफ़र में
लमहात के अलावा क्या था

दिल के ताक़-ए-हरम में
जलते चराग़ के अलावा क्या था

साँसें हुई ज़र्रात सी सौ बार
फ़िर भी रूह का सुकूँ अलहदा था

शामें फ़िरदौस की होती सुक्र गुज़ार
दिल ग़ैरों के चमन में मसरूफ़ था

दुनिया के शौक़-ए-दीदार में
मज़ार के अलावा क्या था

इश्क़ के सर-ए-राह में
हैरानियत के अलावा क्या था ।।

 

-अश्विनी सिंह

 

Ashwani Singh
Ashwani Singh
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