RAJ! Naam To Suna Hi Hoga | Roshan 'Suman' Mishra | Comedy Tadka

RAJ! Naam To Suna Hi Hoga | Roshan ‘Suman’ Mishra | Comedy Tadka

जनवरी की 5 तारीख… दूसरे दिन के अपेक्षा दूनी ठंढ़ महसूस हो रही थी सामने इतना कोहरा की हाथ भी नही सूझ रहा था इस सब के बीच स्कूल का पहला दिन…. पहला दिन का मतलब उस साल और तीसरी क्लास का पहला, उस वक्त बिहार की शिक्षा प्रणाली का वर्ष जनवरी से दिसंबर की ही थी।

लगभग हम भी तैयार हो चुके थें थोड़े उत्साहित भी थें। खुश होना लाज़मी था क्योंकि पिछले 25 दिन के बाद पहली बार स्कूल के दोस्तों से मुलाकात होगी… उधर ठंढ़ हमारी उत्साह को कम करने की असफल कोशीश कर रहा था। हम भी हार मानने वालों में से नहीं थें तो निकल पड़े।

स्कूल जाने से पहले अमित कश्यप के घर जाना होता था फिर साथ में हाथ से हाथ मिलाकर स्कूल जाने की प्रथा को जीवंत करने हेतु दोस्त के घर के लिए निकल पड़े, लेकिन तब मालूम पड़ा कि दोस्त तो बेवफा निकला जब आँटी के मुँह से ये शब्द सुनने को मिला कि “वो तो दस मिनट पहले ही चला गया”  मेरे मन में एक पर एक बहोत सारे सवाल का अक्रामक हमला होने लगा… “क्या इसी दिन के लिए दोस्ती थी… सँग जीने मरने के सारे वादों को असगनी पर टांग दिया… कुक्कुर”।

मुर्झाये बैल की तरह छोटी छोटी कदम नापते स्कूल की दूरी को कम करने लगा… हालांकि स्कूल में पहला कदम पड़ते ही सारा गुस्सा धीरे धीरे खुशीयों में तब्दील होने लगा, लेकिन भीतर के मन में नाराजगी अब भी बची हुई थी।

नजरें तो बस अमित को ढूंढ रहा था हारे थके जैसे ही क्लास में प्रवेश हुआ तो सामने साक्षात आधा घंटा पहले पैदा हुए दुश्मन का दर्शन हुआ जो उस कड़ाके की ठंढ़ में सिर्फ कमीज़ में आया था। मेरा सारा गुस्सा अंदर ही घूँटकर रह गया और मुँह से अचानक यह शब्द निकल गया… “रे पागल… स्वेटर कहाँ है रे तेरा… बड़का सलमान खान बन रहे हो न जब ठंढ़ मार देगा तो सब हीरोगीरी घुसर जाएगी”।

मेरा सारा गुस्सा अभी उतरा नहीं था कि तब तक एक नई लड़की हाथ में किताब का थैला थामे क्लास में घुस गई, उसे देखते ही हम दोनों के ध्यान भटक गए। अनजान लड़की को देखते ही दोनों के मन में बस एक ही बात चल रहा था “शायद इस बार नई एडमिशन कराई है।

पहले तो दो मिनट तक क्लास में खामोशी छाई रही, फिर दोस्त की मुंह से रसगुल्ले के टपकती रस की तरह आवाज निकली… “सुनिए न… आपके बालों का फीता खुल गया है”… ईशारा उस नई लड़की के तरफ था, वैसे उस समय क्लास में सिर्फ तीन लोग ही थें वो भी समझ गई कि इशारा उसी के तरफ है, वो भी अपनी मीठी आवाज से शर्माते हुए “थैंक्स” बोली और पूछी “आपका नाम”…ये वाला प्रश्न मेरे मित्र के तरफ था।

वैसे मैंने उसकी अब तक कोई मदद नहीं किया था तो मैं समझ गया था नाम दोस्त से पूछी जा रहा है और मित्र भी भली भांति समझ चुके थें… नाम पूछने की बात से उनका चेहरा प्रेम में खिल गया था और सहजता के साथ जवाब दिया… “अ… अमित… अरे नहीं… र…र… राज… राज नाम तो सुना ही होगा”।

बस तब से लेकर आज तक मेरे मित्र ऐसे राज बने हुए हैं जो बार बार अपने सिमरन की प्यार की राह देख रहे हैं उनको ये फर्क नहीं पड़ता कि क्या सिमरन भी उनकी प्यार में ऐसी ही सोचती है… या उसने अपनी दिल में राज की जगह सुरेंद्र को दे दिया है।

वाकई प्रेम का रंग तो उस राज से ही है ये जानते हुए कि हम इस कहानी अधूरे किरदार रह जाएंगे फिर भी बेइंतहा प्यार करता है और सिमरन को अपने हर कहानी का आखिरी किरदार चुन बैठा है।

 

 

-रौशन ‘सुमन’ मिश्रा 

 

Raushan Suman Mishra
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