Prem 'Tab Aur Ab' | Mid Night Diary | Raushan Suman Mishra | Love Aaj Kal

प्रेम ‘तब और अब’ | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा | लव आज कल

एक दौर वो भी था जब लड़के दिन में किसी चौक या चौराहे पर ही अपनी वाली को देख कर मन की मुरीदों को पूरा कर लेते थें और रात में उनकी यादों को संजोए साजन मूवी के गीत (बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम) को सुनते हुए प्यार में फिल्मी रंग भर देते थें।

भले ही वो दिखने में वो किसी दक्षिण भारतीय फिल्म के काले ठिगने हास्य कलाकार बर्मानंद की तरह हों लेकिन खुद में “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” के राज के करैक्टर को देखते थें और प्रेमिका में सिमरन…..

फिर स्कूलों में लड़के कॉपी के पीछे गाने को लिखके याद करते थे और अपनी वाली के पीछे वाली सीट पर गुनगुना कर उसे इम्प्रेस करने की कोशिश करते थे!

अगर बात तब भी नहीं बनी तो फिर शाम को स्कूल से लौटते हुए लड़की का पीछा करना… अगर लड़की ने पलट कर देख लिया तो समझा जाता था कि उसके तरफ से सिंग्नल मिल गई है आगे रेलगाड़ी को पटरी पर दौराना बांकी है, फिर उसके रास्ते में उनको दिखा के जो फूल फेंका जाता था औऱ यदि वो उस फूल को हंसते हुए उठा लिया तो समझा जाता था की भाई अब लेटर लिखने कि तैयारी कर लिया जाए….

फिर किसी कयूट टाइप नया नया जवान हुआ पर हाफ पैंट और लखानी चप्पल के तले जिसकी जवानी अब तक उभर नहीं पायी हो ऐसे किसी लड़के का उस कहानी में प्रवेश होता था।

इस चरित्र का भरोसेमन्द होना बहुत जरूरी होता था ताकि उनके प्रेम पत्र को बड़ी गोपनीयता के साथ उनके मुकाम तक ससमय पहुंचा दिया जाय, इस कठनाई भरे कार्य की कुछ मजदूरी तय थीं जिसकी कीमत दो पांच रुपया से भी कम होता था, सस्ता और भरोसेमंद होने के खातिर हर मोहल्ले का अपना अपना डाकियां होता था….

अगर किसी मोहल्ले में संदेशवाहक की पद खाली थी तो फिर प्यार दिल के किसी कोने में ही दफना दिया जाता था क्योंकि उस जमाने में घुटने पे बइठ के हाथ में गुलाब लेके प्रपोज मारने का न तो रिवाज था और ना ही मौका मिलता था।

बस नैन मटका ही उस दौर का मोबाइल हुआ करता था जिसके द्वारा एक दुसरे के भावनाओं का आकलन किया जाता था……

खैर आज ये आलम है मोहल्ले की जगह मोबाईल में फ़ेसबुक पर किसी प्रिया एंजेल को ढूंढते हुए प्रेम की पहली पायदान पर पैर रखा जाता है और अगर उधर से आपकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लिया जाता है तो समझ लिया जाय कि इधर भी सिग्नल साफ़ है।

फिर व्हाट्सऐप जैसे संदेशवाहक का प्रयोग होता है और फिर डोमिनोज की पिज्जा, किसी रेस्टूरेंट का बगर्र, पानीपूरी इत्यादि का सेवन मुँह दिखाई माना जाता है या किसी आई पी मॉल की 3rd फ्लोर या सिनेपालिस की कार्नर वाली सीट पर प्रेम उभरता है, और फिर एक स्मार्टफोन के साथ हाथ में एक पावर बैंक लेकर 24 ×7 न्यूज चैनल वालों की तरह ऑनलाइन बातें होती है।

हालांकि कुछ लड़के लड़कियां जो ईयरफोन कान में लगा के उसका स्पीकर मुँह में दबा जब बात करते हुए दिखते है तो मुझे अपने गाँव के बैलों की याद आ जाती है हमको त लगता है कि नाथ की डोरी को भी गटकना चाहता हो….

इसी तरह सालों बित जाने के बाद वे जब अपनी भावनाएं उनसे व्यक्त करते हैं तो उनका जवाब आयेगा की ” गिव मि सम मोर टाइम” या “मैंने तुमको कभी उस नज़र से नहीं देखा” या “पागल हम एक अच्छे दोस्त हैं” और फिर बिना रिलेशनशिप में आये ही वो एक्स बन जाते हैं।

फिर अपने दोस्तों के साथ बियर की बोतलों को तोड़ने में लग जाते हैं, लेकिन कुछ महिने बाद फिर से कमर कसते हो और सोचते हैं कि उ जो गई उ कउनो आखिरी लड़की थोड़े ना थी फिर कुछ ही दिनों में दुसरी की तलाश जारी होता है…..

वाकई प्रेम भी 21वीं सदी के रंग के ढल चुकी है जिसके अब वो धैर्य लज्जा कहाँ? अब प्रेम के अंदर भी आधुनिकता की धुन सवार हो गई है रोज नए प्रकरण का अविष्कार हो रहा है…

चिन्ता का विषय है की आजकल बढते ऑनलाईन प्रेम प्रकरण के कारण, रास्तेपर खड़े होकर सालों इंतजार करने की प्राचीन भारतीय कला लुप्त होने की कगार पर है।

 

-रौशन मिश्रा “सुमन”

 

Raushan Suman Mishra
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