Peeli Roshani Wala Bulb | Mid Night Diary | Samarpan Pandey

पीली रोशनी वाला बल्ब | समर्पण पाण्डेय | हैप्पी दिवाली

आज बात करते हैं,
वो पीली रौशनी वाले बल्ब की,
अब तो बदल गया है वक़्त,
तब की बात कुछ और होती थी,
कुछ उदास सा लगता था वो,
जैसे किसी ने सूरज को ज़बरदस्ती बुला लिया हो ज़मीं पर।

आज भी देखते हो कभी उस बल्ब को,
कही लगे हुए, ग़मगीन सा नज़र आता है,
शायद, नाकारा कर दिया है लोगो ने,
या शायद शुरू से ही ऐसा था।

बस, हम तो नज़रअंदाज़ ही करते रहे उसे,
कहाँ वो उदासी को चादर बिखेर रहा है,
कहाँ हम माँ के साथ खेल रहे हैं,
पिताजी अभी घर ही आये हैं,
कहाँ बहन उस बल्ब की रोशनी में हमारी मज़ाक बना
रही है।

हाँ, कोशिश बहुत की उसने,
मगर हम भी तो ढीठ थे,
ऐसे ही उदास थोड़े न होते,
हाँ, पापा से थोड़ी डाँठ खा के,
कमरे में कैद होके,

बंद करके, वो दरवाज़ा और वो बल्ब,
चुपके से सुबकियाँ ले लेते थे।
फिर भूख लगती,
तो चुपके से माँ के पास जाके,
उसी बल्ब की कमज़ोर रोशनी में,
पकवान बनवा लेते।

क्या दिन थे वो भी,
शायद, ज़्यादा ही छेड़ दिया हमने उसे,
उसकी पीली रोशनी से ज़्यादा खेल लिए,
अब वो बल्ब भी नाराज़ रहता है,
और हम भी,
शायद उसी बल्ब की रोशनी
अच्छी लगने लगी है।

ऐसी सुनसान जगह पे होगा कहीं,
मेरा प्यारा बल्ब,
पीली रोशनी से,
काली महफ़िलों में उजाला करता हुआ,
मेरा पीछा करता हुआ,
रात को, कही दूर नज़र आएगा,
काँपता हुआ, जैसे अंदर काली,
रोशनी रुख रोक रही हो मेरी नज़र तक का।

अब शायद,
वक़्त के साथ बदल गयी है मेरी रोशनी।

 

-समर्पण पांडेय

 

Samarpan Pandey
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