Pardeshiyon Ke Mele | Mid Night Diary | Roshan 'Suman' Mishra

परदेशियों के मेले | रौशन ‘सुमन’ मिश्रा

घास पर बिखरे ओस की बुँदे छोटी छोटी मोतियों की तरह चमक रही है ठंडी नरम हवा मन को ओत प्रोत कर रही है, दूर तक खेतों में सिर्फ धान की कटी हुई जरें दिखाई दे रही है, रमेसर, सुरेसर भी खालीपन के कारण आजकल गहरी नींद में सोने लगा है क्योंकि सबने अपने खेतों के धन की कटाई कर ली है…

लेकिन दीना के आँखों से अब भी नींद गायब है, रोज उलटी गिनती गिन रहा है उसे तो पिछले साल के मेले की याद सता रही है, पिछले साल सुलेखिया के अचानक से पेट में उठी दर्द के कारण पुरनिया अस्पताल का चक्कर काटना परा था और जब तक सुलेखिया की तबियत ठीक होती तब तक कोशी के किनारे लगने वाला मेला खत्म हो चुका था….

अब दीना रोज दिन कोसी मैया को गोहरा रहा है… “हे माई… पिछले साल कोनों भूल चूक, गलती, सालती जो भी हो गया था ओकरा सब के अपना प्रताप से माफ कर दीजिए… बुच्चु बाबु के खेत में कुछ धान लगले है उसको काटते ही हम जरूर आयेंगे और जेतना भी पिछलका मानल दानल मुन्गबा आ लडु है सब अहि बेर चढाएंगे….”

बुच्चु बाबू का नाम पुरे सहरसा में प्रसिद्द है गाँव जबार में उनकी इक्का हुकुम चलती है उनकी सारी राज पाट विरासत में मिली हैं उसके निर्माण में उनका योगदान शून्य के बराबर ही मानाजाएगा, सम्पति अर्जन का सारा श्रेय उनके दादा जी धनाकरे बाबू को दिया जाता है…

नदी पेटी की सारी जमीन अंग्रेज ही धनाकर बाबु को सौगात स्वरुप भेंट किया था, धनाकर बाबू अंग्रेज के लिए खबरी का काम करते थें और इसी काम में विलासनगर के स्वतंत्रता सेनानी खदेरन की गुप्त सुचना उन्होंने ही तहसीलदार साहब को दिए थें……

इधर सुलेखिया बैल को खाना लगते हुए गीत गुनगुना रही है…… आखिर दो साल बाद फिर से मेला घूमने जाएगी, सुलेखिया का मायके भी उस कोसी किनारे लगने वाले मेला के क्षेत्र से ही सटा हुआ है तो वो आस लगाई है किन जाने बचपन के कितने सहेलियों से मिलेगी…

पिंकिया, रामबतिया का भी ख्याल आने लगा है… चन्द्रकला भौजी कैसी दिखती होगी… अब त मनोहरा भी बड़का हो गया होगा… लाल काकी न जाने मायके के सारे लोगों को याद याद कर रही है….. अकलेस अपने दोस्तों से कह रहा है…. “ रे बिन्देसरा अब हम नही खेलेंगे… इ तोहर बारी है खेल लो हम अपन बदला कल ही खेल लेंगे….

लेट भी हो रहा है और बैल के लिए घास भी काटना है आज घास सबेरे नही लेके गए त आज हमारा मेला देखने का टिकस भी केंसिल हो जाएगा…

आज बाऊ बोलें हैं कि बैलगाड़ीये से ले जाएंगे….. रे रकेश तुम त परसुए गया था न रे अच्छा! इ बताओ कि बंदर के खेल देखाने बला अइ बेर आया है कि नही रे?…

अकलेस अपने स्कुल का कपड़ा कल ही साफ़ कर लिया था आज उस को बार बार सहेज रहा है…. इस कपड़े को ही पहन कर वो मेला जाएगा मने कि आज हीरो हमहीं हैं…. बार बार आईने में अपने चेहरे को निहार रहा है….

सुलेखिया भी हाथ पैर रंग ली है, पेटी से नयका साड़ी निकाल रही है जो खेलाबन भैया के बियाह में खरीदी थी, उस शादी के बाद आज फिर दूसरी बार ही पहनेंगी… बैल भी भर पेट खाने के बाद इतरा रहा है….

दीना भी सारे धान को काटकर तेजी से बुच्चू बाबू के हवेली पर पहुंचते ही आवाज लगाई… “गिरहस…सारे धान कट गया है बाद बांकी बोइंन हम कल ही ले लेंगे, आज कुछ ज्यादा ही थकनी बुझा रहा है”…

(अपने मेले जाने के राज को छुपाते हुए)…. घर के भीतर से ही बुच्चू बाबू आवाज देते हैं… “रे दीना… तनी देर रुक… हम बाहरे आ रहे हैं, तब तक उनकी पत्नी उनसे कहती है…. “ए जी सुनिए न… उ दीनमा के बोलिये न कि छोटकी कनिया के मेला घुमा के ले आएगा… घर में उसका मन ऊब गया है… पिछले साल हमहुँ मैया के प्रशाद नहीं चढ़ा पाए थे… बोलिये न बैलगाड़ी लेकर आ जाएगा…”

अरे बेचारा कय दिन का थका हुआ है इस बार छोड़ दो अगले साल ठीक रहेगा…

इतना बुच्चू बाबू के बोलते ही उनकी पत्नी पूरे आंगन में एक पैर पर ही नाचते हुए बोली…”कोनो हम अपना लिए थोड़े बोले हैं …

कनिया के मन नहीं लग रहा है तो बोल दिए… आपको क्या है भर दिन घूमे आते हैं… आपसे बोलकर मुँह खराब कर लिए”…. अच्छा ठीक है… दरवाजे पर जाते ही बोलें… “रे दीना…आज तुम त सच्चे बहुते थक गया होगा… लेकिन एक ठु बहुत जरुरी काम बांकिये रह गया है उ कर दो फिर दू दिन नहीं आना… छोटकी बहु का मन कर रहा है मेला देखने का… और हम बोल दिए हैं कि दीना घुमा कर ले आएगा”…. बस इतना काम कर देते”…..

दीना अपनी स्वामिभक्ति के कारण पूरे दशकोसी में प्रसिद्ध है तो मालिक के बातों को कैसे काट सकता है…उदास घर की तरफ़ बैलगाड़ी को लाने के लिए निकल पड़ा… उसके आंखों में आंसू दिखाई दे रहे हैं…

रास्ते में बहुत सारी बातें उसके दिमाग में चल रही है… पछतावा भी हो रहा है कि बेकार नौकरी कर रहें हैं… क्यों इस जेल में बंधक बने हैं…. मन में सोच रहा है फिर क्या करेगा… बहोत सारे सपने जो देखें हैं उसका क्या होगा?….. कैसे सुलेखिया को गहना खरीद देगा… फिर अकलेस को कैसे पढायेगा?….

आज भी देश में लाखों दीना अपने घर परिवार की दो पल की खुशी के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं, अपने सारे सुखों की गला घोंटकर परिवार के लिए किसी बुच्चू बाबू के सामने अपने स्वामिभक्ति की प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर रहे हैं..

अब उसे न तो घर जाने की याद आती है और न ही किसी पर्व त्योहार का इंतजार रहता है… उसे तो अब परिवार की खुशी में ही अपनी खुशीयों का अहसास होता है।

(घर से दूर सारे परदेशियों को समर्पित.. जो छुट्टियों के अभाव से इस दिवाली औऱ छठ पूजा में नहीं आ रहे हैं)

 

-रौशन ‘सुमन’ कुमार

 

Roshan 'Suman' Mishra
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