Parda | Mid Night Diary | Vaidehi Sharma

पर्दा | वैदेही शर्मा

जिस रोज़ पर्दे का गिरना होगा,

मैं आऊँगा फिर तुमसे हाथ मिलाने,

तुम्हें मुझे करीब से दिखाने,

उन तालियों की गहरी आवाज़ों के बीच,

उन लोगों की सुलगती आंखों के बीच,

वो झिलमिलाती पोषाक उतारकर,

सारे सम्मानों को यूँ नकारकर,

चेहरे पर भी कोई आभ ना होंगे मेरे,

फिर क्यों ये दुनिया भला मुझको घेरे,

हर तरह से सारे सम्वाद को दाँव पर लगा कर,

कुछ हँस कर कुछ रो कर कुछ भुला कर,

जिस रोज़ थक जाऊँगा मैं यह खेल दिखा कर

कोई कलाकर भी ना साथ होगा मेरे,

सफर ही बस साथ होगा मेरे

ताल के सभी ताल नश्वर बना कर,

वो सारे राग खुद को ही सुनाकर.

फिर किसी नई कहानी को ना हाथ लगाऊंगा मैं,

शायद यूँ ही टूट कर मंच पर गिर जाऊँगा मैं,

फिर मेरी आवाज़ का ना कोई रंग होगा,

फिर मुझसे जुड़ा ना कोई ढंग होगा

थोड़े थके धीमें कदमों से आगे बढ़ता हुआ,

उस तकाज़े को अपने अंदर समेटता हुआ,

कुछ खोता हुआ,

कुछ कहता हुआ,

कुछ मरता हुआ,

तुम पहचान तो लोगे ना?

अस्ल किरदार मेरा…!

 

-वैदेही शर्मा

 

Vaidehi Sharma
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2 thoughts on “पर्दा | वैदेही शर्मा

  1. Kch baatein jo keh k ankahi lge
    Sun k ansooni ho
    Vo h kch tum mein v kahin
    kch mjh me v dabi
    Vo lamha yu kb aayga
    Ehsaas ka samandar jb chalak jayga
    Intezaar h intezaar h …….

    . Deep feeling

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