Paramatma Ke Sandesh | Mid Night Diary | Raghv Bharat

परमात्मा के सन्देश | राघव भरत

चलने से पहले आवाज़ यक़ीनन दी होगी उसने,

यूँ ही कहाँ कोई ख़्वाबों में दस्तक देता है।

आज नहीं कुछ दिनों बाद मिल लूंगा जाकर अभी मौसम बहुत सर्द है ,पहाड़ की बात और है पर मैदान की ठंड जान ले लेती है, आखिर मन को बहलाने को बहाना बनाने में हम सब माहिर हैं।

मन तो कई दिनों से था के मिल लूँ जाकर , आखिर रह – रह कर किसी की याद क्यों आयेगी ,पर ये महीने के आखिर में मेरे हाथों को गाँधी जी की तस्वीर थामने की आदत है इसने जैसे पैरों में जंजीर बांध रखी थी।

पर उसके ना रहने की ख़बर जब मिली उस वक़्त जो जिस्म ठंडा पड़ा वो शायद सूर्य-पृथ्वी के कितना करीब आ जाता गर्म नहीं होने वाला था।

बात – बात पर जिन आखों से आँसू निकल आते थे वो निष्प्रभ थीं ,यादों का बवंडर मन- मस्तिष्क को झकझोर कर यही कह रहा था ” संदेश वक़्त पर भेजा गया था ” तुम ही नहीं समझ पाये “सरकार” और बटोर लो पैसे।

परमात्मा कभी गलत नहीं करता गलती हम करते हैं , समझ कर भी बहाने बनाते हैं और फिर वो कल कभी नहीं आता जीवन में जिस कल की हम प्रतीक्षा करते हैं।

निष्प्राण शरीर ! आपको किसी सत्य से मिलवाये ना मिलवाये इस सत्य से ज़रूर मिलवाता है के मृत्यु ही सत्य है आप कितना भी बटोर कर रख लें जाना खाली हाथ और अधूरी ख्वाहिशों के साथ ही है , आपने जीवन कितना भी स्वाभिमान और अहँकार में बिताया हो उसका कोई मूल्य नहीं है , आपके कर्मो की गठरी ही आप के प्राणो के साथ नवीन शरीर में जायेगी।

जिन हाथों ने कभी आपके नन्हे हाथो को थामा हो जिन कंधो पर सवार होकर आपने अपनी नन्ही आँखों से ऊंचाई तक देखा हो , उस निष्प्राण शरीर का आपके कंधे पर होना ये बताने को काफी है जीवन में आपको आगे बढ़ाने में उसने कितना बोझ उठाया होगा।

वक़्त रहते अपनों के लिए वक़्त निकालिये वरना आपके कमाये पैसे आखिर में केवल चन्दन की चंद लकड़िया खरीदने के काम आएँगी ,और आप तमाम उम्र इस अफ़सोस में जियेंगे, मैं मिल सकता था मैं देख सकता था एक बार और और उसका हाथ मेरे सर पर हो सकता था।

रिश्तों में आये अपने अहँकार और अपनी बिना वजह की व्यस्तता को किसी हवन की ज्वाला में डाल कर समय रहते भस्म करें।

क्यों की अंत में ” राम नाम ही सत्य है ,कृष्णा नाम ही सत्य है “

 

-राघव भरत 

 

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