पर ज़िंदगी चलती रही | जय वर्मा

घड़ी-घड़ी , क्षण- क्षण , कदम-कदम ,
पर छलती रही।
खुद ही बनाया गूमड़,
और उसे मलती रही।

कई बार घेरे निराशा,
और ये खलती रही।
अब है खत्म कहानी या बाकी,
असमंजस में डुलती रही।

पर, जिन्दगी चलती रही..
जिन्दगी चलती रही..
कुछ ने कड़वे शब्द कहे,
कुछ ने लगाया मरहम।

कुछ तो बस खुशियों के संगी,
कुछ बांटते हैं बस गम।
कुछ रुलाने को आतुर,
कुछ आंखें खुद नम।

कुछ तोड़ते हैं हौसला,
कुछ बढ़ाते दम।
कुछ तो प्रकाश रहता है,
और कुछ छाया है तम।

दो-दो समाज के बीच,
उम्र ये ढलती रही।
पर, जिन्दगी चलती रही..
जिन्दगी चलती रही..

 

-जयहिन्द वर्मा “जय”

 

Jay Verma
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