Nishchhal Prem Ki Abhivyanjana | Mid Night Diary | Vishal Swaroop Thakur

निश्छल प्रेम की अभिव्यंजना | विशाल स्वरूप ठाकुर

हां आने लगी हो तुम मेरे सपनो में ख्वाबों के रस्ते पर चलते हुए। तुम वह तितली हो जो बाग़ को चारो तरफ से बंद किये जाने के बाद भी उस में आने से वंछित नहीं रह पाती।

मैं घोर तम को अपने चारों ओर लपेटे हुए सपनो के पाटों को बंद किये हुए निर्वात में खोया हुआ था, सोया हुआ था। तुम उस अँधेरे में बंद पाटों को पार कर उसी निर्वात में आ ही गयी। लेकिन अब, अब वह निर्वात नहीं रह गया था।

वहां पर प्रेम मयी संगीत का सृजन हो रहा था। वही तम अब एक मनोरम पलों में तब्दील होने की एक अनिश्चितकालीन साजिश करने लगा। तुम्हारी मात्र एक छुअन से से मेरी रूह का कतरा कतरा हिलोरे ले रहा था।

भले ही यह सब एक सपना था लेकिन पहले की तरह अधूरा सपना नहीं था। इस बार तुम किसी जरूरत के लिबास को ओढ़कर नहीं आई थी। जिस प्रेम की अभिव्यंजना उस क्षण में अभिव्यंजित हो रही थी वह पहली बार घटित हो रही थी।

इस बार ना ही मैं गैरजरूरी था और ना ही तुम्हारी मुझे छलने की ही साजिश थी। उन क्षणो में मैं अब मैं नहीं रह गया था और ना ही तुम वह रही गयी जो तुम हुआ करती थी। मैं तुम में खोया हुआ था और तुम मुझमें।

फिर सुबह भी हुई। तम भी मिट गया। निन्द्रित नयनों के कपाट भी खुल गये। बहुत कुछ बदल गया,लेकिन जो नहीं बदला था वह था तुम्हारा एहसास, तुम्हारा प्रेम, वह तितली के रंग, वह समा, वह छुअन।

और तुम्हारा निश्छल प्रेम की अभिव्यंजना।

 

-विशाल स्वरुप ठाकुर

 

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