Nishaan

इक उम्र होती है, हर चीज की एक तयशुदा उम्र होती है! उसके बाद ही हम उन चीजों से वाबस्ता होते है! मसलन चलने की उम्र होती है, बोलने की उम्र होती है! ठीक वैसे ही सोचने और समझने की भी इक उम्र होती है! हाँ जिसे हम आम भाषा में होश  संभालना कहते है!

मैंने होश कब संभाला ये तो मुझे ठीक से अब याद नहीं! पर हाँ जब से होश संभाला तब से यही देखा था!

एक छोटा अँधेरा सा कमरा, मेरे बचपन की पूरी जवानी लगभग वहीँ बीती! बचपन के बुढ़ापे में जा कर कहीं मैं उस अँधेरे से बाहर निकल पाया!

तकरीबन छह साल का रहा होऊँगा, अब भी याद है वो शायद पहली दफा मैं रुबरु हुआ था या शायद  वो यादों में सबसे पुरानी है!

मुझे भूख लगी थी, अपने अँधेरे कमरे से निकल मैं माँ को टोहने लगा था! उस रोज थोड़ी तबियत ठीक नहीं थी तो जरा जल्दी उठ गया था!

मेरे कमरे से लगा गलियारा था और गलियारे से लगे बाकी के कई कमरे! मैं माँ को आवाज देता बढ़ा जा रहा था! अचानक से एक कमरे से माँ की आवाज आई , उसने मुझे बुलाया नहीं था ये तो कुछ अजीब सी ही आवाज थी! पर मैं उसकी आवाज पहचानता था!

दरवाजा खोल अंदर दाखिल होना शायद मेरी पहली और आखिरी गलती थी! उसके बाद गलती की हिम्मत ही नहीं रही!

कमरा लगभग अँधेरा ही था, पर अब तक अँधेरे कमरे में रह कर मैं अँधेरे में भी हलचलों को देखना सीख गया था!

मैं दरवाजे पर ही ठिठका था, उन दोनो को अब तक मेरे आने की खबर नहीं थी! हाँ वहाँ माँ अकेली नहीं थी और भी था कोई! मोटा सा भद्दा सा इक शख्स! माँ के तन पर कपडे नहीं थे! और यही हाल उस मोटे का भी था! माँ अपने पैरों को उसके पेट की दोनों तरफ को कर उस पर बैठी थी! उसने माँ के बाल पकड़ रखे थे और दूसरे हाथ से उसके कसावों को ढक रखा था! हाँ मैंने होश संभाल लिया था और यूँ अपनी माँ को देखना! मैं बहुत कुछ कहना चाहता था पर शब्द नहीं बना पा रहा था क्या कहूँ कैसे कहूँ..और सबसे जरुरी किससे कहूँ..!

उसने माँ की जगह बदली और इसी क्रम में माँ की नजर मुझपर पड़ गयी! वो जोर से चिल्लाई और मुझे बाहर जाने को कह दिया!मैंने अपने हाथी से भी भारी हो चुके पाँव को पूरी मेहनत और ताकत के साथ उठाया और बाहर जा कर गलियारे में खड़ा हो गया!

कुछ देर बाद माँ बाहर आई! उस दिन पहली और आखिरी बार उसने मुझे पीटा , खूब पीटा…!  उस पिटाई के निशान छपते गए दोनों के जेहन पे, मेरे भी और माँ के भी! ये शायद दुनिया में इकलौता वाक्या होगा जब पिटाई करने वाला पिटाई के बाद पिटने वाले से ज्यादा रोया होगा! हाँ दर्द भी तो उसका कहीं ज्यादा था मुझसे!

बहरहाल उसके बाद मुझे बाहर की रौशनी चुभने लगी! और अनायास ही वो अँधेरी कोठरी मुझे भाने लगी थी! मैं अपनी हदे और माँ की मजबूरियाँ समझ गया  था!

वक़्त चलता रहा! मै अब उन गलियारों को और कमरों को समझने लगा था! माँ के साथ साथ और भी जितनी आंटियां थी उन सबकी हकीकत भी! कभी कभी दूर से खड़ा हो देखता था उन्हें, जब वो मुंडेरे पे खड़े हो नीचे चल रहे राहगीरों को रिझाने की कोशिश करती थी! अमूमन उनलोगों के तन पे साड़ी नहीं होती थी सिर्फ ब्लाउज और साया होता था! ब्लाउज भी गहरे गले का! चेहरे पे गहरा मेकअप और वो तरह तरह के इशारों के साथ उन्हें रिझाने की कोशिश करती थी!

यूँ उनको देखना , कैसा लगता था ये तो बयां नहीं कर सकता! अक्सर भावशून्य ही हुआ करता था मैं! पर ये ही तो मेरी सच्चाई थी, उनकी सच्चाई थी! भला इससे भागकर जाता भी तो कहाँ!

माँ जब मेरे साथ होती थी, बिलकुल बदल जाती थी तब वो माँ लगती थी! मुंडेरे पर उसे देखकर लगता ही नहीं था कि ये वही औरत है! जाने कैसे खुद को एक ही दिन में इतनी बार बदल लेती थी!

मैं उसे बस देखता ही रहता था! रोटी खिलाते हुए उसके चेहरे पर जो सुकून का भाव होता था वो शायद हर माँ के चेहरे पर होता होगा, ऐसा मैंने सोचा है!

कुछ समाजसेवकों ने हम जैसे लोगो के लिए एक अलग स्कूल की व्यवस्था कर दी थी! मैं भी वहाँ जाने लगा! वहां के माहौल की सबसे अच्छी बात ये थी की कोई भी बाप का नाम नहीं पूछता था! हम सभी एक जैसे ही थे! लेकिन इस जेहन का क्या करूँ! जैसे जैसे बड़ा होता गया ये भी शशक्त होता गया! सवाल अब आईने से आने लगे थे!

माँ मुझे भांपने लगी थी! मैं बारह का हो गया था! मुझे कभी भी याद नहीं मैं माँ के साथ सोया होऊँगा! वो वक़्त तो उसके काम का होता था! दिन में वो काम ढूँढती थी और रात में करती थी! उससे बात करता भी तो कब!

उस रोज रात पहली बार उसे कमरे में देखा! उसकी आँखों में आँसू थे! आज वो कही बाहर गयी थी! वो दराज़ से डेटोल निकाल अपने गर्दन के खरोंचों को सहला रही थी! मैं..उसके हिसाब से सो चूका था, असलियत में तो मैं उस कच्ची सुबह का ही जागा था! नींद उसके कमरे में उसी रोज छोड़ आया था मैं कभी गया ही नहीं फिर , जो वापस ला सकूँ! पीठ की छीलन तक उसके हाथ पहुँच नहीं पा रहे थे!

मैंने उसके हाथ से डेटोल ले लिया ! उसने झट से अपने आँसू पोछे! उसके पास अनुभव भी था और महारत भी!

“तू सोया नहीं अभी तक”

“नहीं”

हम शायद ही कभी बात करते थे उस रोज के बाद!

“माँ”

मेरी पुकार में दर्द और करुणा दोनों बराबर मात्रा में थी! उसके निशानों का दर्द महसूस कर सकता! पीठ के निशान और साथ में रूह के भी!

“क्या हुआ रे बोल”

उसकी आवाज में अनुभव और महारत साफ़ झलकते थे! बदल ली थी उसने अपने चेहरे की भंगिमा बड़ी खूबसूरती से! यूँ के जैसे कोई पायजामे की छेद को कमीज से ढाँप लेता है , ठीक वैसे ही उसने कहा

“खाना खाया तूने?”

रात का खाना वो अक्सर मेरे साथ ही खाती थी! आज बाहर जाने की वजह से…..

मैंने भी नहीं खाया था अब तक! मैं तो उस रोज से ही भूखा हूँ जब सुबह तड़के भूख के मारे उठ गया था! खाना ले रख दिया है मैंने.! दोनों बैठ गए है!

आज जाने दिल में क्या है सोचता हूँ सारी भूख मिटा लूँ..पूछ लूँ सारे सवाल!

“माँ”

इस बार सिर्फ करुणा थी! तीव्र तीक्ष्ण! आँसू मेरे पलकों के ठीक पीछे तक पहुँच चुके थे! अपनी इस पुकार का असर मुझपर इतना हुआ था तो उस पर कितना हुआ होगा!

“बोल न क्या हुआ”

पर ये क्या फिर वही भावशून्य चेहरा, उसने मेरी पुकार सुनी भी या नहीं! बिन पूछे ही जवाब क्यों नहीं देती! मैं पुछु भी तो क्या और जवाब भी भला क्या मिलेगा! मुझे तो मालूम ही है सब!

“ये चोट कैसे लगी “

“अरे ये..वो सीढ़ी है न रे, अँधेरे में ठीक से दिखी नहीं तो बस फिसल गयी! अब बूढी हो चली हूँ न आँखे कमजोर हो गयी है सोचती हूँ इक चश्मा ले लूँ”

उसने हँसने की कोशिश की! वही अनुभव और महारत का बखूबी इस्तेमाल! मैंने चाहा की कह दूँ बारह का हो गया हूँ सब समझता हूँ! ये सीढ़ियों के निशान है या नाखुनो के दाँतो के! पर माँ से कहूँ…….कैसे भला….

“हम दूसरी जगह नहीं जा सकते?”

मैंने कुछ सवालो को टाप लिया था एक छलाँग में! वो खाना खा चुकी थी अब!

“चल जा सो जा”

उसने मुझसे भी ऊँची छलाँग लगायी और सारे जवाब टाप गयी!

“तुम इक रोज मेरे साथ नहीं सो सकती?”

मैंने भी आँसूं रोके! अनुभव भले न हो जज्बातों को छुपाने की कला मुझे विरासत में मिली थी!

वो चलते हुए लँगड़ा भी रही थी! आज शायद कही जाने की हालत में नहीं थी!

कितने सालो के बाद माँ मेरे इतने करीब थी!

“माँ”

मेरी दबी आवाज में इस बार सिर्फ दर्द था!

“ज़रा सर पे हाथ रख दोगी”

उसने बिना कुछ कहे ही मेरे बालों में अपनी उँगलियाँ फँसा दी! मैं उसके सीने से लग गया! माँ फिर से मेरे सामने माँ के रूप में थी!

“हम कहीं और नहीं जा सकते?”

मैं फिर से उसे वहीँ ले गया! आज फैसले के मूड में था! उसके चक्रव्यूह को तोड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी! मैंने माँ की उँगलियाँ पुटकानी शुरू कर दी! हाँ पहले बचपन में कई बार मैं अपनी छोटी नाजुक उँगलियों से उसकी उँगलियाँ पुटकाने की कोशिश करता थी! वो खिलखिलाहट फिर कभी नहीं दिखी उसके चेहरे पे!

“कहाँ जायेंगे रे”

आवाज में नमी मैं पहचान रहा था! मैंने उसके अनुभव पर विजय प्राप्त कर ली थी!

“कही भी”

हम दोनों ने एक दूसरे की आँखों में देखा! कमरे में घुप्प अँधेरा था! पर हम दोनों ही अँधेरे में देखना बखूबी जानते थे!

मैंने आगे बढ़ कर उसके आँसू पोंछे, जाने कब से ये करना चाहता था! आज जा कर मौका मिला था! हमने जी भर के बातें की फिर, हाँ वो माँ थी मेरी माँ! मैं रोया वो भी रोयी!

मैंने तय कर लिया था यहाँ से माँ को निकालने का! पर माँ उसे तो न ही कोई उम्मीद थी और न ही कोई घुटन! कैसे कर लेती थी वो ये सब! उसको चिंता बस मेरे भविष्य की थी! और मुझे उसके वर्तमान की!

अपने लिए तो वो कब की मर चुकी थी इसलिए ही शायद कुछ भी महसूस नहीं होता था! पर मेरे लिए वो मेरी माँ थी, मर तो शायद मैं भी चूका था! पर मर कर भी मैं अपनी माँ के दर्द को जान पाता था! और वो मेरे! हम दोनों मुर्दे एक दूसरे के दुःख को समझते थे, खुद से कहीं ज्यादा और शायद यही वो दुःख था जिसने हम मुर्दो को भी अब तक जिंदा लोगो के वर्ग में रखा हुआ था!

माँ ने मेरे भविष्य के लिए कुछ पैसे जमा किये थे! जो वो मुझे दे यहाँ से कहीं दूर भेज देना चाहती थी! उसने किया भी ऐसा! मैं अब भी तेरह का था उससे लड़ नहीं पाया! वो मुझसे कहीं बड़ी लड़ाकू थी! ज़िन्दगी से, खुद से, लोगो से , हालातों से सब से लड़ते आयी थी वो जाने कितने सालो से!  उसने मुझे हरा दिया था! मैंने भी उसकी बात मान ली! मैंने वहां से जाना स्वीकार कर लिया!

जब तक आप खुद दलदल में फँसे हो दूसरे को नहीं निकाल सकते! पहले आपको खुद को बाहर निकालना होता है! तभी आप दूसरों को भी बचा सकते है! मैंने भी ऐसा ही किया! माँ को मालूम नहीं था, मैं अगली लड़ाई की तैयारी में था! अगली बार उसे हरा देना है मुझे ले जाना है उसे यहाँ से दूर!

जाते वक़्त फिर वही भावशून्य आँखों ने मुझे विदा किया! मैं भी उनकी मजबूती तोडना नहीं चाहता था सो उन आँखों को आइना दिखा आया!

हॉस्टल में आगे की पढाई को बड़े शहर आ गया था! ये भी उन्हीं समाज सेवको की मेहरबानी से थी!यहाँ लोगो को मेरे बारे में कुछ भी मालूम न था! अगले साल ही मैं दसवी में था!

कुछ दोस्त बन गए थे मेरे! आखिर माँ से सीखा था मैंने यूँ अभिनय करना, मजाल है जो कोई मुझे पहचान सके! पर मन…वो अब भी उस अँधेरी कोठरी में था!

बोर्ड की परीक्षा के बाद दोस्तों ने पार्टी करने की सोची! मैं बिल्कुल भी इन चीजों से जुड़ा नहीं था फिर अभी अभिनय तो करना ही था! उन लोगो ने शराब पी है मैंने भी थोड़ी थोड़ी सी! और वो ये किसे लाए है! चार हज़ार रुपये में पूरी रात के लिए किसी को ले कर आये है वो!

उनके लिए एक लड़की है वो या फिर सिर्फ इक बदन इक जिस्म! जिसे खरीद लाये है वो इस्तेमाल करने को! और मेरे लिए……माँ..!

हाँ मैं माँ को देख पा रहा था उसमें, यूँ ही कही किसी कमरे में आज माँ भी होगी! और मैं यहाँ! कौन सी तैयारी में लगा हूँ, हर दिन बिक रही है वो, शायद सिर्फ मेरे लिए !और मैं…

मैं उसी रात हॉस्टल से भाग खड़ा हुआ! कई दिन यूँ ही भटकता रहा! फिर मैंने एक पाव भाजी का ठेला लगा लिया! कुछ पैसे थे मेरे पास जो माँ ने दिए थे! मुझे पढाई नहीं करनी थी, मुझे कोई इंजिनियर या डॉक्टर नहीं बनना था! मुझे तो सिर्फ बेटा बनना था…बेटा अपनी माँ का, बस..!

चार महीनो में मैंने रहने का ठिकाना पक्का किया! बस कैसे भी माँ को ले कर आना था!।मैं भाग खड़ा हुआ फिर उस कोठरी की तरफ!

“चलो माँ”

“तूने पढाई क्यों छोड़ दी”

उसे सब पता चल चुका था!

“माँ ..चल”

मेरे पास एक ही जवाब था, उसके हर सवाल से कहीं मजबूत कहीं दृढ़! उसने मेरी ओर देखा, अब और अभिनय नहीं अब और काबू नहीं! वो फूटने वाली थी! मैंने उसकी बाह पकड़ी और कहा

“माँ ..चल”

आज एक ही बात थी कहने, जाने कितने ही मतलब समेटे! मैं उसे अपनी झोपडी में ले आया!

कई रात वो जागती रही, उन रातों के निशान जो थे! पर धीरे धीरे सब धुंधले पड़ते गए! मैंने अपनी माँ को पा लिया था! अब वो माँ थी बिना किसी मिलावट के शुद्ध खालिश माँ…!

मैं अब पैंतीस का हो चूका हूँ, अपना रेस्टोरेंट है अब मेरा! एक पाँच साल की बेटी भी है! माँ अब हँसती है बोलती है! वो अभिनय भूल चुकी है, ख़त्म हो गयी है वो महारत उसकी, मिट गए है सारे निशान!

पर उस रोज की पिटाई के निशान अब भी मेरे जेहन पे है.! वो बेबसी..माँ की! खुद की इतनी बुरी तरह से पिटाई शायद ही किसी ने की हो!

– अमृत

बेजान रिश्ता अमृत राज
Amrit
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