Nirbhaya | Mid Night Diary | Aditi Chatterjee | #16Dec

निर्भया | अदिति चटर्जी | #१६दिसंबर

कल फिर एक और शाम बीत गई,
बस लेकर उसका नाम बीत गई।

हमने फिर चौहराहो पे दीए जलाए,
मोमबत्तियाँ हाथों में लिए जलाए,

दिसम्बर की सर्दी में फिर खून में गर्मी हुई,
हुई नम आँखे और सांसो में भी नर्मी हुई,

फिर एक साल हमने सह कर गुज़ार दिया,
फिर हादसों के ख़बरों ने हमको बेज़ार किया।

कल फिर एक और शाम बीत गई,
बस लेकर उसका नाम बीत गई।

ली थी कितनी कसमे हमने
कसमे सारी टूट गई,

रो रही होगी कहीं वो
रूह उसकी रूठ गई,

होती जो दरिंदगी कहीं , वो खड़ी देखती होगी,
जिंदा हो या हो मुर्दा, ‘लाचार हूँ’ सोचती होगी,

सहम जाती होगी वो जब शाम घना छाता होगा,
दबे पाँव धीरे धीरे कोई दरिंदा आता होगा,

कल फिर हमने उसको ज़िंदा कर के मार दिया,
फिर कल उम्मीद को उसके हमने तार-तार किया।

कल फिर एक और शाम बीत गई,
बस लेकर उसका नाम बीत गई।

कल फिर कोई निर्भया समेट कर खुद को सोयी होगी,
कल फिर कोई निर्भया घुट घुट के रोयी होगी,

कल फिर कोई निर्भया दुपट्टे से खुद को बचायी होगी,
कल फिर कोई निर्भया ज़िल्लत से खुद को मिटायी होगी,

कल फिर कोई निर्भया बस में डर- डर चढ़ी होगी,
कल फिर कोई निर्भया बंद कमरे में ही पड़ी होगी,

कल फिर कोई निर्भया झुका के नज़रे चली होगी,
कल फिर कोई निर्भया आईने से न मिली होगी,

कल फिर कोई निर्भया अपनों से ही रूठी होगी,
कल फिर कोई निर्भया बहुत गज़ब की टूटी होगी।

कल फिर एक और शाम बीत गई,
बस लेकर उसका नाम बीत गई।

 

 

-अदिति चटर्जी

 

Aditi Chatterjee
Aditi Chatterjee

702total visits,2visits today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: