Nar Sanhaar Ab Band Karo | Mid Night Diary | Anubhav Kush

नर संहार अब बंद करो | अनुभव कुश

गोली से, तोपों के गोलों से घर टूटे पक्के पक्के,
रोटी को और छाया को तड़प रहे सारे बच्चे।
सारे फसाद की जड़ वहां उपस्थित संसाधन हैं,
जान गंवाते घूम रहे बच्चे भी तो सबका धन है।
युद्ध के अतिरिक्त भी एक कर्म युद्ध होता है शर्म करो,
सबसे करबद्ध निवेदन है ये नर संहार अब बंद बंद करो।

कर्म जो ऐसा क्रूर करोगे, प्रकृति भी रंग दिखलाएगी,
मासूमों का जो कत्ल करोगे धरती भी क्रुद्ध हो जाएगी।
बदले में खुदा तुम्हारा खेल कुछ यूं रचाएगा,
संतान वियोग में तड़पेगा और वंश तेरा मिट जाएगा।
अश्रु तुम्हारे सूख गए क्या, खत्म अब ये सर्ग करो,
सबसे करबद्ध निवेदन है, ये नर संहार अब बंद करो।

न तुम्हारे आकाओं ने क्या युद्ध संहिता का पाठ किया,
मासूम निहत्थों को मारा क्यों ऐसा कठोर पाप किया।
छन-छन कर लाशों के ज़ख्मों से रक्त सिंध बह आई है,
बांध बना तो लो उसपे पर भंवर में कमी न आई है।
अब ले डूबेगा तुझको, जितना तुम प्रयत्न प्रसंग करो,
सबसे करबद्ध निवेदन है, नर संहार अब बंद करो।

दर्ज तुम्हारे नाम होंगे इतिहास में पृष्ठ अनेक,
पढ़ जिन्हें दहक उठेगा बारंबार मानव प्रत्येक।
सब पृष्ठ रक्त की दुर्गंध से आसक्त कर ही दोगे,
स्नेह छोड़ आघाती हृदय में विष भर ही दोगे।
विश्वासघात, मृत्युप्रयास, अत्याचार अब बंद करो,
सबसे करबद्ध निवेदन है ये नर संहार अब बंद करो।

 

-अनुभव कुश

 

Anubhav Kush
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