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नन्नी खुशियाँ | अमन सिंह | #उन्मुक्तइंडिया

अभी तक यही जानता था कि खुशियाँ खरीदी नहीं जा सकती और न ही सुकून की कोई कीमत लगाईं जा सकती है लेकिन, लेकिन यह सच भी कितना गलत निकला बिल्कुल उसी बात की तरह कि एक अकेला इंसान क्या कर सकता है। बीत गयी पिछली शनिवार की रात को यकीन मानिये मैंने न सिर्फ खुशियाँ ख़रीदी बल्कि सुकून से भी अपनी जेबें भर ली।

हर किसी दूसरे दिल्ली में रहने वाले बैचलर लड़के की तरह मैं भी सेंट्रल पार्क में बैठकर खामोश खुद में ही उलझा कुछ तलाश रहा था कि तभी एक छोटा सा लड़का अपने साथ में कुछ गुब्बारे लेकर पास आया और मुझसे कुछ गुब्बारे खरीद लेने की जिद करने लगा।मैं तो खुद में ही इनता उलझा हुआ था कि मैंने उसकी बात पर गौर ही नहीं किया। जब मेरी तरफ से उसे कोई जवाब न मिला तो उसने मेरी तरफ़ कुछ गुब्बारे बढ़ाते हुए कहा, “भैया ये गुब्बारे शायद आपके लिए गुब्बारे होंगे लेकिन ये मेरे लिए खुशियाँ हैं, इन गुब्बारों में मैंने हवा नहीं अपना बचपन और कुछ सपने भरे हैं। क्या आप मुझसे मेरे लिए कुछ खुशियाँ खरीद सकते हैं?”

उसकी बात सुनकर जैसे मेरे शब्द भी खामोश हो गये, मैं चाहकर भी उसे कोई जवाब नहीं दे पाया। मैंने उससे सारे गुब्बारे खरीद लिए जो मेरे लिए तो सिर्फ गुब्बारे ही थे लेकिन शायद उसके लिए खुशियाँ ही होंगी जो उसकी आँखों में नज़र आ रही थी और अब आप सोच रहे होंगे इसके बदले मुझे क्या मिला? आपकी बात भी ठीक है, हम बिना मतलब के कोई काम करते भी कहाँ हैं? तो आपको बता दूँ, पिछली रात सुकून की रात थी। उस सुकून की रात जिसे मैं कितने अरसे से तलाश रहा था। अब बारी आपकी है, जाइये और खरीद लीजिये कुछ खुशियाँ और सुकून, कुछ अपने लिए कुछ अपनों के लिए…

 

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