नन्नी सी जान | राघव भरत

ईशा और गौरव छोटे से खूबसूरत पहाड़ों से घिरे शहर  में रहते थे ।
एक शाम गौरव के ऑफिस से आने पर ईशा ने उसे खुशखबरी दी के घर में नन्हा मेहमान आने वाला है ।
ये सुनकर गौरव ने प्यार से उसके माथे को चूमा और उसके कान में बोला ,आखिर 5 साल बाद परमात्मा ने हमारी सुन ली ।
नन्हे मेहमान के आने की ख़ुशी हर वक्त गौरव के चेहरे पर दिखती थी वो चाहता था के अपने ऑफिस में उसे शेयर करे पर कभी कहीं किसी की नज़र ना लग जाये ये सोचकर खामोश ही रहता ।
दोनों हसीं ख़ुशी रहते थे एक दूसरे के लिए पहले से ज़्यादा ज़िम्मेदार गौरव जहाँ थोड़ा रिज़र्व किस्म का इंसान था वहीँ ईशा इसके विपरीत । गौरव को ग़ज़ले सुनना पसंद था तो ईशा को ज़्यादातर वक़्त सोशल साइट्स पर बिताना और फ़ोन पर बात करना ।
गौरव अब अपने ऑफिस के काम जल्द निपटाने की कोशिश में रहता के शाम को वक्त पर जल्द घर पहुँच कर ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त ईशा के साथ बिताए ,उसके ज़्यादा वक़्त का मतलब ईशा के मन के काम करना होता था और ईशा के गर्भ में अपनी संतान को महसूस करना होता था ।
अब वो कार भी धीमे चलाता था इस डर में के उसे कुछ हो गया तो ईशा का क्या होगा ,बाहर के टूर भी कम कर दिये थे आखिर समय करीब आ रहा था हर हफ्ते ईशा को डॉक्टर को दिखाना और उनकी राय को अमल में लाना यही काम रह गया था उसका।
इक शाम ईशा ने गौरव से कहा …
सुनो
परसो माँ और पापा मेरी छोटी बहन के साथ हमारे साथ रहने आ रहे हैं और बच्चे के होंने तक यहीं रहेंगे
पर ईशा अभी तो 1 महीना है तुम उनको क्यों परेशांन कर रहे हो उनसे कह दो 1 हफ्ते पहले आ जाएं इतने दिन वहां घर अकेले छोड़ना भी सही नहीं है गौरव ने कहा । फिर तुम जानती हो वो मुझे पसंद भी नही करते और मैं अपने ही घर में दबा दबा सा रहता हूँ .
क्यों दबे से रहते हो तुम्हारा घर है जैसे चाहो वैसे रहो ईशा ने कहा।
याद है जब वो दिसम्बर में आये थे कितना लड़ी थी तुम और तुम्हारी छोटी बहन ,सिर्फ इस लिए के मैं महीने के आखिर में वक्त नहीं दे पाया था ।
कुछ सोच कर ईशा ने कहा पर अब मैं कैसे मना करूँ अब तो टिकट भी हो गये है ? परेशान मत हो मैं हूँ न सब संभाल लुंगी ।
गौरव चुप रहा और उठ कर ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा ।
माँ और पापा के आने वाले दिन स्टेशन गया पैर छुए और उनको घर लेकर आया ,पर स्टेशन पर ईशा की बहन ने ना गौरव से नमस्ते करी न ही गौरव ने कुछ कहा वो बस मन ही मन मना रहा था भगवान सब सही रखना ।
मार्च की क्लोजिंग और घर में इतने लोग जो आये तो मदद करने थे पर हो सब उल्टा ही रहा था ईशा दिन भर किचेन में लगी रहती डॉक्टर ने मना करा था पर हर वक्त माँ की सेवा में लगी रहती और अपनी ओर ध्यान भी नहीं दे रही थी ।
ये सब देखकर गौरव हर समय खिन्न रहने लगा उसे लगने लगा जैसे ईशा को बांटा जा रहा है उसकी माँ जो कहे ईशा वही करती है ,अब तो ईशा पूछती भी नहीं दिन कैसे बीता ,वो चाहता था उसे बताना के उसके टारगेट इस बार 2 साल से बेहतर हुए हैं ।
एक रात वो हो ही गया जिसका डर गौरव में था ….!
ईशा और गौरव अपने रूम में सोए थे के अचानक ईशा की माँ रूम में बिना आवाज़ करे चली आयी दोनों ही हड़बड़ा गए और गौरव ने कहा माँ आप को ऐसे नहीं आना चाहिए था , मैं तो आऊंगी मेरी बेटी है ,मां आप ग़लत कर रहे हो ईशा ने कहा पर माँ तो जैसे कुछः सुनने को तैयार ही नहीं थी बात बढ़ गयी कुछ ज़्यादा ही बढ़ गयी मकान मालिक ऊपर आ गए और बीच बचाव की कोशिश करने लगे इतने में ईशा की माँ ने गौरव पर हाथ उठा दिया ……!
कमरे में सन्नाटा सा छा गया और गौरव रात में घर से चला गया , ईशा को मैसज किया “हमारे बच्चे का ध्यान रखना”
1 दिन बाद सुबह ईशा ने गौरव को फोन करा घर आ जाओ घबराहट हो रही है वो डर से भागा के कहीं ईशा की तबियत न ख़राब हो गयी हो पर वहां तो माहौल ही अलग था ,परदे के पीछे छिपे ईशा के अंजान रिश्तेदार अपनी सीमाओं को पार कर गौरव के साथ बत्तमीजी करने लगे वो किसी तरह बालकनी से कूद कर भागा और अपने घर पर फोन कर बताया ,बदनामी के डर से पुलिस के पास नहीं गया ।
कुछ देर बाद पुलिस का फोन उसके ही पास आ गया और उसे घर बुलाया वो पहुंचा तो महिला कानून और अधिकारों का हवाला देकर पुलिस ने ईशा को परिवार के साथ माँ के घर जाने की मांग को गौरव को बताया ।
उसने समझाने की बहुत कोशिश करी ऐसे में सफर मना है कुछ अनहोनी हो सकती है पर कोई सुनने वाला नहीं किसी को उसके आंसू महसूस नहीं हो रहे थे ।
ईशा चली गयी न कोई मैसज न फ़ोन ।
छटपटाहट बढ़ती जा रही थी पर वो कुछ कर नहीं पा रहा था आखिर उसे पता चला के उसे पुत्र रत्न प्राप्त हुआ है । पर उस से पहले ये खबर दुनिया को थी ,जिस लडक़ी के लिए उसने अपने समाज को छोड़ दिया उस ने उसे न बता कर दुनिया को उस से पहले बताया ।
फिर भी वो मिलने जाने को हुआ के अंजान फोन ने रही सही कसर भी पूरी कर दी ,आप आइये हम तलाक के कागज़ तैयार करा रहे हैं साइन करिये और जहाँ शादी करनी हो कर लें ।
चाह कर भी न वो जा पाया न उसका परिवार मानसिक रूप से परेशान और करे क्या कोई बताने वाला नहीं दिन महीने बीतने लगे तमाम कोशिशें करी पर सब बेकार ।
मन में सोचता है उसकि नन्ही सी जान ऐसे दिखती होगी वैसे दिखती होगी मंदिरों के चक्कर काटता है परमात्मा मेरे बच्चे और पत्नी की रक्षा करना ।
वो जो खिलौने अपने बच्चे के लिए थे उनके साथ उसे महसूस करता है ,हर दिन 2 लाइन अपने बच्चे के लिए लिख कर रकह देता है के कभी वो शायद उन्हें पढ़ेगा ।
शायद जीवन रहने तक कभी उसे मौका मिले अपनी नन्ही सी जान को सीने से लगाने का ,पर ये जो पल उसके बिना बीत रहें हैं उन्हें कौन लौटायेगा ये सवाल दिन रात उसे खाये जा रहा है !

-राघव भरत

Raghv Bharat

722total visits,1visits today

One thought on “नन्नी सी जान | राघव भरत

Leave a Reply